भूतिया फ्लैट की डरावनी कहानी

मेरा नाम आसिफ है। कुछ ही दिनों पहले मैं एक नए फ्लैट में शिफ्ट हुआ था। वह दो रूम वाला फ्लैट हर मायनों में मेरे लिए काफी बड़ा था। चूंकि वह फ्लैट मुझे काफी सस्ते में मिल गया था, इसलिए मैंने उसे खरीदने में जरा भी देर नहीं की। उस दिन मैं सुबह से ही सामान को लाने और उन्हें सजाने में व्यस्त रहा था और जब शाम हुई, तब-तक मैं काफी ज्यादा थक गया था। मुझमें और काम करने की हिम्मत नहीं बची थी। रात का भोजन करने के बाद मैंने ज़मीन पर ही गद्दे को बिछाया और तकिया डाल कर सोने चला गया। बहुत ज्यादा थके होने के कारण मुझे जल्दी ही नींद आ गई।

देर रात, मुझे समय का जरा भी अंदाजा नहीं, मेरी नींद कुछ गिरने की ज़ोरदार आवाज़ से खुल गई। मैंने उठकर कमरे की बत्ती जलानी चाही, मगर बिजली नहीं थी और अंधेरे में मुझे मेरा मोबाईल भी नहीं मिल रहा था। मैं वैसे ही अंधेरे में दीवार को टटोलता-टटोलता अपने कमरे से बाहर आया।

तभी मुझे अपने हाथों पर भयानक ठंड की अनुभूति हुई। मुझे ऐसा लगा कि मैंने दीवार की ठोस सतह की जगह किसी पिलपिली सी चीज को छू लिया था और वह इतना ठंडा था कि मुझे फौरन उसपर से अपने हाथ हटाने पड़ गए। एक पल के लिए मुझे ऐसा लगा कि मैंने किसी ठंडे पड़ चुके मृत शरीर को छू लिया था। वैसे मैं इतनी आसानी से नहीं डरता, मगर उस दिन अंधेरे कमरे में हुई उस घटना से मेरा दिल वाक़ई जोरों से धड़कने लगा था।

मैंने फिर से दीवार को छूने की चेष्टा की, मगर इस बार मुझे वहाँ वैसी कोई अनुभूति नहीं हुई। मेरे हाथों तले दीवार की ठोस सतह ही थी। बहरहाल कमरा अब भी अंधेरे में डूबा हुआ था। बिजली अब भी नहीं थी और मुझे अब भी यह पता लगाना था कि आखिर मेरी नींद किस चीज के गिरने की आवाज़ से खुल गई थी।

इससे पहले मैं एक कदम आगे बढ़ाता, मेरे कानों में दरवाज़े की चरमराहट की आवाज़ आई। दूसरे कमरे का दरवाज़ा अपने आप ही खुल गया था। तभी बिजली आ गई और जैसे ही कमरा रोशन हुआ, मैंने उस अंधेरे दूसरे कमरे में किसी चीज को गायब होते हुए देखा। सच बोल रहा हूँ वह मेरा कोई भ्रम नहीं हो सकता था। मैंने वाक़ई उस कमरे में किसी को देखा था। कोई ऐसी चीज जो अंधेरे में छुप गया था या फिर मुझे कहना चाहिए कि वह भी अंधेरे में पूरी तरह से घुलकर गायब हो गया था।

मेरे हाथ पैर दोनों डर के मारे अकड़ गए थें। मैं अभी-अभी इस नए फ्लैट में शिफ्ट हुआ था और मैं वहाँ ऐसे किसी को भी नहीं जानता था, जिसके पास जाकर मैं रात गुजार लेता। खैर बिजली के आ जाने से मुझमें थोड़ी हिम्मत जरूर बंध गई थी और मैं आहिस्ते-आहिस्ते उस दूसरे कमरे की तरफ बढ़ा। दिल की धड़कने तेज हो चुकी थीं और मेरी योजना बिल्कुल सरल और स्पष्ट थी। मैं सबसे पहले उस दूसरे कमरे में जाकर लाइट जला देने वाला था। इससे कमरे में फौरन रोशनी हो जाती और मेरा कुछ डर अवश्य ही कम हो जाता।

पर जैसे ही मैं दरवाज़े की तरफ बढ़ा, वह दरवाज़ा एक बार फिर से चरमराते हुए थोड़ा खुल गया। ऐसा लग रहा था कि वहाँ उस कमरे में जो कोई भी था, मुझे यह बता देना चाहता था कि वह अब भी वहाँ मौजूद है। मुझमें एक और कदम आगे बढ़ाने की हिम्मत नहीं हुई और मैं फौरन सब कुछ छोड़कर अपने कमरे में चला गया।

मुझे नींद नहीं आ रही थी। मैंने अपने कमरे की लाइट जला रखी थी। मुझे मेरा मोबाईल मिल गया था। उस वक्त रात के तीन बज रहे थें। मुझे मालूम है कि ऐसा करना बिल्कुल भी सही नहीं था, फिर भी मैंने अपने डर पर काबू पाने के लिए, देर रात अपनी गर्लफ़्रेंड को कॉल लगा दी। उसका नाम आकांक्षा है। अच्छी बात यह रही कि उसने फोन उठा लिया। मैंने उसे सारी बातें बताई। मेरी बात सुनकर वह मुझसे भी ज्यादा डर गई। फिर मुझे उसे समझाना पड़ गया, जिससे मुझमें भी थोड़ी हिम्मत आ गई। बात करते-करते सुबह हो गई और तब जाकर मैंने फोन रखा और फिर जाने कब मुझे नींद आ गई, मुझे इसका जरा भी अंदाजा नहीं है।

जब मोबाईल की घंटी बजी, तो मेरी नींद खुली। मैंने उठकर देखा कि मुझे आकांक्षा ने ही कॉल किया था। उस वक्त दोपहर के दो बज रहे थें। इससे पहले मैं आकांक्षा का कॉल उठा पात कि तभी मेरी आँखों ने एक ऐसा दृश्य देखा कि जिससे मेरे रोम-रोम में दहशत फैल गया। बात यह थी कि मैं सोया तो अपने कमरे में था, मगर उठा उस दूसरे कमरे में। मैं जिस गद्दे पर लेटा था, उसे देखकर ऐसा लग रहा था कि कोई उसे घसीट कर दूसरे कमरे में ले आया था। मेरा गद्दा बिल्कुल तिरछा और अस्त-व्यस्त था। उधर फोन का बजना जारी रहा। पर मैं ऐसे सदमे में था कि मेरे कानों में उसकी जरा भी आवाज़ नहीं आ रही थी।

कुछ समय लग गया मुझे वापिस होश में आने में। मेरी आकांक्षा से बात करने की इच्छा नहीं हुई। मैं उठा और स्नान करने चल पड़ा। नहाते वक्त भी मुझे बड़ी अजीब सी अनुभूति हो रही थी। ऐसा लग रहा था, जैसे कोई मुझे देख रहा हो। मैं बार-बार पीछे मुड़कर देखता कि कहीं सचमें मुझे कोई देख तो नहीं रहा। इसी बीच अचानक ही नहाते-नहाते झरने का पानी बर्फ से भी ज्यादा ठंडा हो गया और मैं फौरन पीछे हटा। न जाने कैसे पानी का तापमान इतना ज्यादा कम हो गया था। मुझे इसका कारण समझ में नहीं आ रहा था। खैर मैं स्नान करके बाहर आया और कपड़े-लत्ते पहनकर, मैंने अपना फोन उठाया और खाना ऑर्डर किया। आधे घंटे के बाद दरवाज़े की घंटी बजी। खाने की डिलीवरी करने आए उस लड़के ने मुझे मेरा ऑर्डर दिया और पैसे लेकर वहाँ से चला गया। खाना खाने के बाद मैं पुनः घर को सजाने में व्यस्त हो गया। इस दौरान मैं यह भी देखता रहा कि आखिर पिछली रात किस चीज के गिरने की आवाज़ आई थी, जिससे मेरी नींद खुल गई थी। मगर मुझे वहाँ कुछ भी नहीं मिला। फिर जल्दी ही मेरे न चाहते हुए भी रात घिर आई। मैंने एक बार फिर से खाना ऑर्डर किया और खाना खाने के बाद सोने सोने के लिए चल पड़ा। मैंने कमरे के दरवाज़े को अच्छी तरह से बंद कर लिया था। कुछ करवटे इधर-उधर बदलने के बाद मुझे नींद आ गई। समय का पता नहीं, मगर देर रात मेरी पल भर के लिए आँखें खुली। और तभी मुझे ऐसा लगा कि कोई मेरे बिस्तर के पास खड़ा था। मैं फौरन नींद से जाग उठा, और घबड़ाए मन से उस दिशा में देखने लगा, जिस दिशा में मैंने किसी को खड़े देखा था। एक बात तो मैं फौरन समझ गया था कि अब मुझे नींद नहीं आने वाली थी। मैं बिस्तर से उठा और पानी पीने किचेन की तरफ बढ़ा।

जब मैं अपने कमरे से बाहर आया, तो मेरी एक नजर उस दूसरे कमरे की ओर गई और ठीक पिछली रात की तरह, उस कमरे का दरवाज़ा बेहद आहिस्ते से चरमराते हुए खुल गया। मैंने फौरन लाइट जलाने की कोशिश की। मगर बिजली नहीं थी। फिर मैंने जल्दबाजी दिखाई और मोबाईल के लाइट को ऑन किया और उस कमरे की तरफ रौशनी कर दी। उस पल मुझे ऐसा लगा कि मेरा कलेजा, मेरे मुँह को आ गया था। क्योंकि मुझे दरवाज़े पर किसी के हाथ नजर आए थें। मैं अपनी जगह पर जम सा गया था। फिर मेरे कानों में दिल को दहला देने वाली आवाज़ आई।

“आसिफ यहाँ आओ। मैं तुम्हें कुछ दिखाना चाहती हूँ। क्या तुम मुझे देखना नहीं चाहते?”

“आसिफ यहाँ आओ। मैं तुम्हें कुछ दिखाना चाहती हूँ। क्या तुम मुझे देखना नहीं चाहते?”

“आसिफ यहाँ आओ। मैं तुम्हें कुछ दिखाना चाहती हूँ। क्या तुम मुझे देखना नहीं चाहते?”

मैं नहीं जानता क्यों, मगर मेरे पैर अपने आप ही उस दूसरे कमरे की तरफ बढ़ने लगे। मैं बहुत ज्यादा डरा हुआ था। मैं उस कमरे में दाखिल हुआ। फिर हिम्मत करके मैंने अपने मोबाईल के टॉर्च को ऊपर किया और मेरे ऐसा करते ही मुझे वहाँ एक लंबी काली परछाई नजर आई। वह दीवार से उलटी चिपकी हुई थी। उसने मुझे देखा और फिर जोर से हँसी और बेहद तेजी से मेरी तरफ आई।

पीछे भागने की कोशिश में मैं नीचे गिर पड़ा और फिर बेहोश हो गया। मुझे अगले दिन जाकर होश आया। शुक्र था कि मेरे शरीर में अब भी प्राण थें। मैंने उसी पल उस भूतिया फ्लैट को खाली कर दिया। उस दिन के बाद से मेरे साथ ऐसी कोई भी घटना नहीं घटी। मगर मैं जानता हूँ कि इस दुनिया से परे एक अलग दुनिया है, जहाँ हम जैसे जीवित प्राणियों की कोई औकात नहीं है। बहरहाल उस काली परछाई का चेहरा अब भी मेरे मन में जैसे का तैसे बना हुआ है और वह मुझे जब भी याद आती है, मेरी रूह काँप उठती है।

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Ritu Raj

मेरा नाम ॠतु राज है और मैं आपका Magical Hindi Stories में स्वागत करता हूँ। मेरी कोशिश आप सभी पाठकों तक ऐसी नई और रोचक हिंदी कहानियाँ पहुँचाने की है, जिन्हें आप अवश्य पढ़ना चाहेंगे।

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