अलविदा एमा

कहते हैं कि किसी वस्तु के प्रति आकर्षण अच्छी बात है, पर जब वह वस्तु शापित हो तब वही आकर्षण चिंता, दुखों और डरावनी रहस्यमयी घटनाओं का कारण बन जाती है। ऐसी ही एक घटना जेनेट नामक शहर में घटी। एलिसा रोजी बताती है कि यह सन् 1822 की घटना है। जब वह 5 साल की थी। उसके पास अलग-अलग तरह की बहुत सी गुड़ियाएँ थी। सभी एक से बढ़कर एक। इतनी सुंदर कि कोई भी उन्हें अपने पास रख लेना चाहे। मगर उन अनेक गुड़ियों में से एक एलिसा रोजी के सबसे ज्यादा करीब थी। एलिसा बताती है कि तब वह बेहद सुंदर और आकर्षक थी। और यह कहानी भी इसी गुड़िया से जुड़ी है।

पांच साल की उम्र से लेकर नौ साल की उम्र तक वह गुड़िया मेरे पास रही। उसका नाम एमा था या शायद है। मेरे नौ साल के होते-होते मेरी तरह एमा भी काफी बदल चुकी थी। शायद उसका कद कुछ इंच बढ़ गया था और देखने में भी वह थोड़ी व्यस्क नजर आने लगी थी। एमा के साथ हुई मेरी पहली घटना, वैसे तो ज्यादा खास नहीं है, पर दिलचस्प ज़रूर है। एक रोज मुझे स्कूल के लिए तैयार होना था। मेरी माँ की तबियत थोड़ी खराब थी और मेरे पिता नाश्ता बनाने में व्यस्त थें। इसलिए मुझे खुद ही तैयार होना था। मैं अलमारी से अपने स्कूल के कपड़े निकालने के लिए पहुँची। मगर मेरे कपड़े वहाँ नहीं थें। मैंने सारा घर छान मारा, मगर मुझे मेरे कपड़े कहीं नहीं मिले। फिर मैंने अपने पिता से पूछा। और वे बोले “तुमने तो अपने स्कूल के कपड़े पहन रखे हैं।” मैंने वाकई स्कूल के कपड़े पहन रखे थे। मुझे अच्छी तरह से याद है कि मैं पिछली रात अपनी नाइट ड्रेस पहनकर सोई हुई थी। फिर सुबह होते-होते मैंने कब कपड़े बदल लिये, यह बड़ी हैरानी की बात थी। मैं और हैरान तब हुई, जब मैं कमरे में पहुँची। क्योंकि वहाँ बिस्तर पर मेरा स्कूल बैग और नीचे जूता रखा हुआ था। खैर उस दिन तो मैंने इन बातों पर ज्यादा गौर नहीं किया और स्कूल के लिए निकल पड़ी।

फिर अगली घटना ठीक एक सप्ताह के बाद रविवार के दिन घटी। मेरी माँ स्वस्थ हो चुकी थीं। हमलोग उस दिन पिकनिक पर जाने वाले थे। मैं उस खिलखिलाती सुबह अपनी गुड़िया को पिकनिक के लिए तैयार कर रही थी। जब गलती से नाखून काटते वक्त उसकी थोड़ी सी ऊँगली भी कट गई। मैंने देखा कि एमा बुरी तरह से काँपी और मैं डर के मारे दो कदम पीछे चली गई। एमा की आँखों से आँसू बह रहा था। यह देखकर मुझे डर तो लगा, मगर मैं उसका कारण समझने के लिए अभी बहुत छोटी थी।

शाम को जब हम पिकनिक से लौटे, तब-तक मैं बहुत थक चुकी थी। रात का खाना हमने बाहर ही खा लिया था। मैं उस दिन एमा को अपने साथ पिकनिक पर लेकर नहीं गई थी। जब मैं अपने कमरे में पहुँची, तो वह मुझे कहीं नजर भी नहीं आई। मैं बिस्तर पर लेटी और न जाने कब गहरी नींद में चली गई।

सुबह मुझे अपने पूरे शरीर में काफी जलन और दर्द महसूस हुआ। मुझसे उठा भी नहीं जा रहा था। इसलिए मैंने अपनी माँ को आवाज़ लगाई। मुझे आज भी याद है, जब मेरी माँ कमरे में पहुँची, तब वह किस तरह से पागलों की तरह चीखी थीं। मेरे पूरे शरीर पर खरोचें थी। मेरा चेहरा भी नहीं बचा था। पूरा बिस्तर खून से सना हुआ था। मैंने देखा कि एमा मेरे ठीक सामने कुर्सी पर बैठी मुझे घूर रही थी। तो फिर इसमें नया क्या था, जिसने मुझे डरा कर रख दिया। दरअसल पिछली रात उस कुर्सी पर एमा नहीं थी। वह तो पूरे कमरे में ही मौजूद नहीं थी। मैंने गौर किया कि एमा की गर्दन जो हमेशा बाईं ओर मुड़ी रहती थी, वह उस दिन बिल्कुल सीधी थी और वह मेरी तरफ देखकर मुस्कुरा भी रही थी। मेरे पिता मुझे फौरन अस्पताल लेकर गए। डॉक्टर ने बताया कि मुझे नाखूनों से खरोंचा गया था। घर वालों ने शक जताया कि रात में किसी शरारती बच्चे ने खिड़की से आकर ऐसा कर दिया होगा। पुलिस के पास रिपोर्ट दर्ज कराने का भी कोई फायदा नहीं था, क्योंकि हम जहाँ रहते थें, वहाँ आस-पास बहुत से शरारती बच्चे रहा करते थे। सभी से पूछ-ताछ करना संभव नहीं था। शाम होते-होते हम अपने घर लौट आए। अब मुझे एमा को लेकर थोड़ी चिंता होने लगी थी। मैंने उसकी आँखों से बहते आँसू को देखा था और उसे मुस्कराते हुए भी। यह कोई आम बात नहीं थी। मैं अपने कमरे में नहीं जाना चाहती थी। उस दिन मेरे जिद करने पर मेरे माता-पिता ने मुझे अपने साथ सोने की अनुमति दे दी। पर ऐसा हमेशा तो नहीं चलने वाला था।

अगले दिन भी मैं घर में पड़ी रही और रात होने का इंतजार करती रही। मेरा कमरा पहली मंज़िल पर था। मेरे माता-पिता नीचे सोया करते थे। और घर में कोई ऐसा भी नहीं था, जिसके साथ मैं सो सकूँ। मैं अपने माँ-बाप की इकलौती बेटी थी। खैर, रात हुई और मैं भोजन करने के बाद अपने कमरे में चली गई। मेरी माँ ने कमरा साफ कर दिया था। खून से सने चादर को पहले ही बदला जा चुका था। जब्कि एमा ठीक मेरे बिस्तर के बीचों-बीच बैठी हुई थी और उसकी गर्दन सीधी नहीं, बल्कि बाईं ओर घुमी हुई थी। जिस तरफ दरवाज़ा था और जहाँ मैं खड़ी थी। फिर मैंने उसके होंठ हिलते हुए देखे। वह मुस्करा रही थी। खैर मैं कमरे में दाखिल हुई। मैंने एमा को बिस्तर से हटाकर कुर्सी पर रख दिया और सोने चली गई। पर मुझे नींद नहीं आई। जाहिर है मैं काफी डरी हुई थी। मैंने चादर से अपने सिर को ढ़क रखा था। देर रात मैंने कुर्सी में हलकी सी चरमराहट महसूस की। मैंने चादर के अंदर से छोटी सी जगह बनाकर, बाहर देखने की कोशिश की। एमा कुर्सी पर नहीं थी। मेरा डर तब और बढ़ गया, जब मैंने वही चरमराहट अपने बिस्तर पर महसूस की। दरअसल एमा मेरे बिस्तर पर चढ़ रही थी। मैंने अपनी आँखों को बंद कर लिया। एमा ने चादर हटाकर मेरे कान में कुछ कहा। शायद वह किसी तरह का मंत्र था। महज कुछ ही पलों में मैं होश खोने लगी। पर जाने क्यों मैं तब भी चीजों को समझ पा रही थी। उसने मुझे अपनी ओर घुमाया। मैं उसकी ताकत महसूस कर पा रही थी। उसने अपने दोनों हाथों से मेरी बंद आँखों को खोला। मैंने एमा की आँखों को देखा। वे वहीं आँखें नहीं थी, जो मैं हमेशा से देखती हुई आई थी। उसकी पुतलियाँ इतनी काली थीं कि कोई भी उसे देखकर काँप उठे। और जब उसका शरीर किसी जीवित प्राणी में बदलने लगा, तब मैंने महसूस किया कि वह कोई आम गुड़िया नहीं थी। उसने मुझे चूमा और बिस्तर से उतरकर खड़ी हो गई। उस दौरान मैं बिल्कुल शांत पड़ी रही। फिर मैंने उसकी लंबाई को बढ़ते देखा, और उसके पीछे एक लंबी पूंछ को प्रकट होते भी। वह कोई नरक से आया हुआ दैत्य ही होगा। उसके नाखून काले और बेहद लंबे थे। चेहरा किसी घोड़े की तरह लंबा और उसकी गर्दन आगे की ओर झूकी हुई थी। मेरा पूरा शरीर सुन पड़ चुका था। परंतु मैं होश में थी।

मुझे अच्छी तरह से याद है कि जब खिड़की से चाँद की रोशनी कमरे में आई, तब उसका काला शरीर ऐसे चमकने लगा, मानो उसपर बहुत सी चमकीली चिपचिपी चीज लगी हो। उसके दाँत पैने और बाहर की तरफ निकले हुए थे। फिर कुछ ऐसा हुआ जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। मेरा पूरा शरीर हवा में उठा और उस दैत्य के पास जाकर रुका। मैं चिल्लाना चाहती थी। पर मेरी आवाज़ गले में ही अटक गई।

अभी उसके नाखून मेरे पेट को छुए ही थे कि खुशक़िस्मती से कमरे का दरवाज़ा खुला और मेरे पिता अंदर दाखिल हुए। वह इतनी जोर से चीखे कि दैत्य की नजर मुझपर से हट गई और मैं सीधे ज़मीन पर गिर पड़ी। उस दैत्य ने मेरे पिता पर छलांग लगाई और उनकी गर्दन दबोच कर खिड़की से बाहर फेक दिया। मेरे पिता पहली मंज़िल से नीचे घास के मैदान में जाकर गिरे। तब-तक मुझे इतना समय मिल गया था कि मैं भागकर नीचे पहुँच सकूँ। मेरी माँ उस वक्त सीढ़ियों से ऊपर चढ़ने ही वाली थी, मैंने उन्हें फौरन बाहर भागने को कहा और हम दौड़कर बगीचे में पहुँचे। अच्छी बात थी कि मेरे पिता को ज्यादा चोट नहीं आई थी। वे उठकर अभी खड़े ही हुए थें। उन्होंने मुझसे उस दैत्य के बारे में पूछा। मैंने बताया कि वह और कोई नहीं बल्कि एमा थी।

हमलोगों में ना ही इतना साहस था और ना ही इतनी ताकत थी कि वापिस घर के अंदर जाकर उस दैत्य का सामना करें। संयोग से चर्च हमारे घर के बेहद नज़दीक था, और फ़ादर भी वहीं रहा करते थें। वे एक अनुभवी बुजुर्ग पुजारी थें। हमें उनसे मदद मिल सकती थी। हम फौरन चर्च की ओर भागे। हमने फ़ादर को पूरी बात बताई और उन्हें फौरन अपने साथ घर लेकर आए।

अंदर जाने की हिम्मत तो नहीं हो रही थी, फिर भी हम फ़ादर के पीछे-पीछे घर में गए। हमारे घर में दाखिल होते ही मुख्य दरवाज़ा धड़ाम की आवाज़ के साथ अपने-आप ही बंद हो गया। मेरे पिता ने उसे खोलने की काफी कोशिशें की पर कुछ भी न हुआ। दरवाज़ा पूरी तरह से जाम हो गया था। खैर फ़ादर के कहने पर हम आगे बढ़े। मैंने अपने पिता को काफी जोर से पकड़ रखा था। फ़ादर ने भी अब-तक घर में बुरी शक्ति के होने का अंदाजा लगा लिया था और वे हमें बार-बार सतर्क रहने के लिए कहते रहे, जब-तक की हम मेरे कमरे के दरवाज़े तक न आ पहुँचे।

फ़ादर ने दरवाज़ा खोला। वह दैत्य कमरे में नहीं था। एमा भी कहीं नजर नहीं आ रही थी। हमने उसे बहुत ढूंढा, मगर वे हमें कहीं नहीं मिला। शायद वह चला गया था। फ़ादर ने घर का शुद्धीकरण किया और लौट गए। अगले ही दिन हमें उनकी मौत की खबर मिली। उन्होंने चर्च के सबसे ऊपरी मंज़िल से कूद कर अपनी जान दे दी थी। पुलिस वालों ने इसे आत्महत्या बता कर मामले को रफा-दफा कर दिया।

मगर मैं इस बात को अब-तक नहीं भूली। आज भी मुझे कहीं न कहीं गुड़ियों में बुरी शक्ति के होने की खबर मिलती रहती है और लोगों के मारे जाने की भी। मुझे यही लगता है कि हो न हो वह अवश्य वही दैत्य होगा। यह बात अलग है कि हमारे परिवार को ज्यादा नुकसान नहीं पहुँचा। फिर भी यह कहना गलत नहीं होगा कि इन सब की शुरूआत मेरे घर से ही हुई थी।

यह थीं एलिसा रोजी। जिनकी मौत 78 वर्ष की आयु में हुई। हमें यह कहानी सुनाने के ठीक एक दिन बाद। क्या उनकी मौत प्रकृतिक तरीके से हुई थी। कम से कम मुझे तो ऐसा नहीं लगता। जी नहीं हरगिज़ नहीं। क्योंकि एक दिन पहले तक वह इतनी स्वस्थ नजर आ रही थीं कि वे आसानी से 5 या 6 साल जीवित रह लेती। फिर महज एक ही दिन में ऐसा क्या हुआ जो उनकी मृत्यु हो गई। यह रहस्य तो हमेशा बना ही रहेगा। मगर एक बात जो ध्यान देने वाली है, वह यह है कि उन्होंने घर की दीवारों पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था

“अलविदा एमा”

यह मुझे सोचने पर मजबूर करता है कि क्या मिस एलिसा रोजी अब-तक उस दैत्य से अपना पीछा नहीं छुड़ा पाई थीं।

***

Ritu Raj

मेरा नाम ॠतु राज है और मैं आपका Magical Hindi Stories में स्वागत करता हूँ। मेरी कोशिश आप सभी पाठकों तक ऐसी नई और रोचक हिंदी कहानियाँ पहुँचाने की है, जिन्हें आप अवश्य पढ़ना चाहेंगे।

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