डायन की कुटिया

एक समय की बात है, एक छोटे से गाँव में एक किसान रहा करता था। उसका नाम बाला था। उसके परिवार में कुल चार लोग थें। बाला स्वयं, उसकी पत्नी और दो बच्चे। जिनका नाम मधु और भानू था। वैसे कोई अपने ही बच्चों में ज्यादा भेद-भाव नहीं करता, फिर भी देखने से ऐसा लग ही जाता कि बाला को अपनी बिटिया ज्यादा प्यारी थी। मधु नौ साल की थी और भानू से पूरे दो साल बड़ी थी और बेहद समझदार भी। उस छोटे से गांव में सभी मधु की समझदारी की चर्चा किया करते थें और इसलिए भी बाला अक्सर अपनी बिटिया को लेकर घूमा करता था। ताकि जब लोग मधु की तारीफें करें, तो उसे सुनकर वह मन ही मन प्रफुल्लित हो सके।

एक रात बाला के बेटे भानू की तबियत बहुत खराब हो गई। वह फौरन गांव के इकलौते वैद्य के पास गया और उन्हें अपने घर लेकर आया। वैद्य जी ने भानू की जाँच की, परंतु बीमारी उनके पकड़ में न आई। उसकी हालत को देखकर उन्होंने शीघ्र ही भानू को शहर लेकर जाने को कहा। ताकि वहाँ के चिकित्सक उसकी अच्छे से जाँच कर सके। मगर एक बहुत बड़ी समस्या थी। उनका गाँव शहर से मीलो दूर था। और रात भी बहुत हो चुकी थी। उस सुनसान कच्चे सड़क से होकर शहर जाना भी अपने-आप में बहादुरी भरा काम था।

अब-तक आस-पड़ोस के लोग भी उसके घर के सामने इक्कठा हो चुके थें। सभी बाला से बात करना चाहते थें और उसे शहर नहीं जाने देना चाहते थे। पर समस्या इतनी बड़ी थी कि उन्हें न चाहते हुए भी खुद को शांत रखना पड़ा। “हमलोग तुम्हारे और तुम्हारे परिवार के लिए प्रार्थना करेंगे।” ये वो आखिरी शब्द थे, जो गाँव वालो ने बाला से कही। नौ साल की मधु ने इस बात को समझ लिया था कि गांव वालो की चिंता सिर्फ भानू के प्रति ही नहीं बल्कि किसी और बात को लेकर भी थी।

खैर, बाला ने अपनी बैलगाड़ी बाहर निकाली और दो चार कपड़े-लते अंदर रखकर, अपने परिवार संग शहर की ओर रवाना हो गया। अभी उन्होंने घंटे भर का सफर पूरा किया था और अपने गांव से बहुत दूर निकल आए थे। रास्ता सुनसान था और भानू की तबियत बिगड़ती जा रही थी।

‘बैलों को थोड़ा तेज चलाओ जी, यह इलाका ठीक नहीं है।’ भानू पर कंबल डालते हुए बाला की पत्नी ने कहा।

‘चला तो रहा हूँ। और तेज चलेंगे तो थक जाएंगे। फिर ना हम पहुँचेंगे और ना ही हमारी कोई खबर मिलेगी।’ बाला ने चिंतित होकर कहा।

‘बात क्या है माँ, यह इलाका ठीक क्यों नहीं है और गाँव वाले इतने परेशान क्यों थें?’ मधु ने पूछा।

‘तू जान कर क्या करेगी, इन बातों में अपना दिमाग न लगा और चुपचाप बैठी रह। ये ले तू भी कंबल ओढ़कर दुबक जा और जब-तक हम शहर न पहुँचे आँखें न खोलना।’ उसकी माँ ने कहा और मधु को ज़बरदस्ती सुला दिया।

दो घंटे और बीत गए। बाला चुपचाप उस सुनसान सड़क पर बैलों को दौड़ता हुआ बढ़ा चला जा रहा था। भानू सो चुका था और उसकी माँ उसे पकड़े आँखें बंदकर लेटी हुई थी। शायद वह भी सो चुकी थी। जब अचानक ही बैलगाड़ी की रफ्तार धीमे पड़ने लगी।

‘क्या हुआ पिता जी, आपने गाड़ी क्यों धीमी कर ली?’ मधु ने फौरन उठकर पूछा।

‘आँखें बंद कर ले बिटिया और जब-तक मैं न कहूँ आँखें मत खोलना।’ बाला ने समझाया।

बाला ने अपने बैलों को दौड़ने की कोशिश की मगर वे आगे बढ़ने के बजाय नीचे बैठ गए।

‘पिताजी वह कौन है?’ मधु ने उस सफेद साड़ी में लिपटी औरत को देखकर पूछा।

‘तू किसकी बात कर रही है?’ बाला ने पूछा जो कि उस वक्त नीचे उतरकर बैलों को उठाने की कोशिश कर रहा था।

‘वही जो उस पेड़ पर बैठी है।’ मधु ने कहा।

बाला ने अपनी नज़रें घुमाई और भय से कांप उठा। वहाँ एक औरत सफेद साड़ी पहने, पेड़ की सबसे ऊँची डाल पर बैठी हुई थी। उसने फौरन कहा ‘बिटिया अभी यहाँ जो कुछ भी होगा, तुझे उस दौरान शांत रहना है और उस औरत से ज्यादा बातें नहीं करनी और ना ही उसकी तरफ देखना है। मैं जैसा कहूँ, वैसा ही करना।’   

‘ठीक है पिताजी, क्या मैं माँ को जगा दूँ?’

‘नहीं और अब चुपचाप यहीं खड़ी रह।’

मधु ने पेड़ पर बैठी उस औरत को देखना चाहा, मगर अब वह वहाँ से गायब हो चुकी थी।

‘पिताजी क्या वह चली गई?’ मधु ने पूछा।

‘नहीं बिटिया, वह तेरे पीछे खड़ी है।’ बाला ने कहा और झट से मधु को अपनी ओर खींच लिया।

फिर वह खुद को बहादुर दिखाते हुए बुलंद आवाज़ में बोला ‘ऐ औरत इतनी रात गए कहाँ जा रही है? देखने से तो तू किसी बड़े घराने की नजर आती है।’

वह औरत मुस्कुराई और बेहद डरावने लहज़े में बोली ‘क्या मैं तुझे औरत नजर आती हूँ?’

बाला का चेहरा फीका पड़ गया। मधु भी सहम गई थी, फिर भी वह बहादुरों की तरह शांति से खड़ी रही।

‘ऐसा लगता है कि तेरे बैल थक गए हैं और अब चलना नहीं चाहते।’ उस औरत ने कहा। ‘तुम दोनों मेरे साथ चलो और थोड़ा विश्राम कर लो। मेरा घर इन्हीं जंगलों में है, पर यहाँ से इतनी दूर भी नहीं कि तुमलोग चलकर वहाँ ना जा सको।’

उस औरत ने कहा और जंगल की ओर बढ़ने लगी। बाला भी अपनी बिटिया का हाथ पकड़े उसके पीछे चल पड़ा। शायद इसी में समझदारी थी। मधु अपने पिता को याद दिलाना चाहती थी कि उन्हें भानू को लेकर शहर जाना है। मगर बाला ने उसे इशारों-इशारों में शांत रहने को कहा।

जंगल के टेढ़े-मेढ़े रास्तों से होकर वे दोनों उस औरत के घर पहुँचे, जो कि एक छोटी सी कुटिया थी पर बेहद गंदी और डरावनी। अंदर तीन कमरे थे। एक जिसमें अभी-अभी बाला अपनी बेटी के साथ दाखिल हुआ था, दूसरा रसोईघर और तीसरे कमरे में ताला लगा हुआ था।

मधु ने देखा कि उस औरत का पूरा शरीर सफेद साड़ी से ढका हुआ था। उसने बड़े अदब से बाला और मधु को बैठने के लिए कहा। वे दोनों चुपचाप ज़मीन पर बैठ गए। वह महिला ऐसे पेश आ रही थी मानो बाला और मधु हमेशा से उसी कुटिया में रहते आए हो।

वह रसोईघर की ओर बढ़ी और चूल्हे के पास बैठकर उसमें लकड़ियाँ जोड़ने लगी। तभी मधु को उसके पांव नजर आए जो कि पीछे की तरफ मुड़े हुए थें।

‘पिताजी वह औरत डायन है।’ मधु घबराकर बोली।

‘चुप हो जा बिटिया और मैं जैसा कहूँ वैसा ही करना।’ उसके पिता ने कहा।

अब मधु सचमें डरने लगी थी। वह चुपचाप बैठी उस औरत को निहारती रही जो कि उस वक्त एक मिट्टी के बर्तन में उन दोनों के लिए खाना निकाल रही थी। मधु ने उस डायन को खाने की एक थाली में कुछ मिलाते देखा। जो कि उसके पिता को परोसा गया। खान परोसकर वह डायन उनके सामने बैठते हुए बोली ‘भोजन करके थोड़ा विश्राम कर लो, संभव हुआ तो कल सुबह चले जाना।’

मधु के पिता अब-तक नहीं जानते थे कि उसके भोजन में कुछ मिलाया गया है। और अब वह खाना शुरू ही करने वाले थें।

तभी मधु ने कहा ‘मुझे बहुत प्यास लगी है, क्या आप मेरे लिए पानी ला सकती हैं।’

उस डायन का मन तो न हुआ फिर भी वह उसके लिए पानी लाने रसोईघर की ओर चल पड़ी। इसी बीच मधु ने झट से अपनी थाली, पिता की थाली से बदल लिया। बाला को खतरा महसूस हो चुका था। वह अभी मधु से कुछ कहने ही वाला था कि तभी वह डायन पानी लेकर लौट आई।

उसने अजीब ढंग से मधु को देखा और उसके हाथों में पानी देकर उनके ठीक सामने बैठ गई।

‘अब देख क्या रहे हो क्या तुम्हें खाना नहीं है। जल्दी खाकर सो जाओ, रात बहुत लंबी होने वाली है।’ वह बड़े ही डरावने ढंग से बोली।

बाला ने खाना शुरू किया, पर उसकी मधु के प्रति चिंता बनी हुई थी। फिर उसने देखा कि मधु बड़ी चालाकी से रोटी के टुकड़े करती और उसे अपने कपड़े के भीतर छिपा लेती। बाला को यह देखकर बड़ी हैरानी हुई कि वह ऐसा डायन के सामने बैठे-बैठे कर रही थी और उसे पता भी नहीं चल पा रहा था।

खैर, जब उन दोनों ने भोजन खत्म किया तब उस डायन ने बंद कमरे को खोला और उन्हें सो जाने के लिए कहा। बाला और मधु जैसे ही कमरे में दाखिल हुए, उस डायन ने कमरे को बाहर से बंद कर दिया। अब बाला की चिंता बढ़ने लगी थी और मधु भी बेहद डर चुकी थी। उसने पूछ ही लिया ‘पिताजी अब हम क्या करें? क्या वे हमें मार डालेगी। आपको कुछ करना चाहिए, वह भी जल्दी से जल्दी। माँ और भानू कैसे होंगे। आपको यहाँ आना ही नहीं चाहिए था।’ एक साथ कई प्रश्न उस नन्हीं सी बच्ची के मन में उठ खड़े हुए।

पर बाला खामोश रहा। वह जानता था कि अगर उसने डायन की बात न मानी होती तो वह अवश्य ही उसके परिवार को नुकसान पहुँचा सकती थी। बाला जानता था कि डायनों के सामने पड़ जाने पर बहादुरी इसी में है कि आप बिना कोई सवाल किये, उनकी बात मान लें। उसने वैसा ही किया जैसा उसने अपने बुजुर्गों से सीखा था। शायद इसी वजह से वे दोनों अब-तक जीवित बचे हुए थें।

बाला के मन में रह-रहकर एक प्रश्न उठता रहता कि आखिर उस डायन ने उन्हें अपने घर क्यों बुलाया था। खैर अब उनदोनों बाप-बेटी के पास सुबह तक प्रतीक्षा करने के अलावा और कोई चारा नहीं था। वैसे एक बात कहानी पड़ेगी, जिस पलंग पर बाला और उसकी बेटी अभी-अभी लेटे थें, वह सचमें बड़ी मुलायम और गद्देदार थी। न जाने क्यों वे दोनो उसपर लेटते ही इतने सुस्त पड़ गए कि उनकी आँख लग गई।

समय का पता नहीं फिर भी अंदाजा लगाऊँ तो उस वक्त तीन तो अवश्य ही बज रहे होंगे। जब दरवाज़े में हल्की सी चरमराहट हुई। बाला अब भी गहरी नींद में था, मगर मधु जग चुकी थी। कमरे में जरा सी चाँद की रोशनी थी, जिससे मधु को धूंधला-धूंधला नजर आ रहा था। उसने देखा कि कोई परछाईं दरवाज़े से होकर कमरे की दीवार पर बहुत तेजी से चढ़ती जा रही थी। मधु ने अपनी आँखें बंद कर लीं। फिर उसने जरा सी आँखें खोलकर उस परछाई को पुन: देखने की चेष्टा की। अब वह परछाई उनके सिर के ठीक ऊपर थी और धीरे-धीरे नीचे उतरते जा रही थी। दरअसल वह बाला की तरफ बढ़ रही थी। उसके एकदम पास आ जाने पर मधु को एहसास हुआ कि यह और कोई नहीं बल्कि वही डायन थी, जो उन्हें अपने साथ घर लेकर आई थी। उसने बाला के बाल कटने की कोशिश की, तभी मधु जोरों से चिल्लाई और बाला फौरन उठ खड़ा हुआ।

बाला ने अपने मजबूत पंजो से उस डायन को धर दबोचा और उसे उठाकर दूर फेक दिया। वह डायन उठी और मधु को पकड़ना चाहा पर उसी वक्त बाला ने अपनी बिटिया को अपनी ओर खींचा और दोनों जंगल की तरफ भाग खड़े हुए। जैसे-तैसे वे दौड़ते हुए मुख्य सड़क पर पहुँचे।

अब-तक उसके दोनों बैल खड़े हो चुके थें और जंगल की ओर ही देख रहे थें। मानो उन मासूम जानवरों को भी बाला और उसकी बेटी के आ जाने की प्रतीक्षा थी। वे दोनों जैसे ही अपनी बैलगाड़ी पर सवार हुए, उन्होंने फौरन दौड़ना शुरू कर दिया और तब-तक नहीं रुके जब तक वे सभी शहर नहीं पहुँच गए।

शहर पहुँचकर मधु की माँ की नींद खुली और आश्चर्य की बात यह रही कि भानू भी ठीक नजर आने लगा था। चिकित्सक ने भी भानू को कुछ विटामिनस की गोलियां देकर छोड़ दिया।

बाला और उसका परिवार अगले दिन सुबह होते ही अपने गांव की ओर रवाना हो गए। गांव पहुँचकर उन्होंने यह किस्सा सबको सुनाया। सभी बाला की ताकत और मधु की सूझ-बूझ से बड़े प्रभावित हुए। मधु की माँ और भानू भी इस कहानी को पहली बार ही सुन रहे थें। उन्हें तो इस बात का अंदाजा ही नहीं था कि कैसे मधु ने अपने पिता की जान बचाई और बहादुरी से डायन का सामना किया। असल में यह सब जब हुआ, तब मधु की माँ और भानू सो रहे थें या फिर सुला दिए गए थे।

तब गांव के पंडित जी ने बताया कि उस डायन ने अवश्य ही उन दोनों पर जादू किया होगा, जिसकी वजह से वे सो गए होंगे। और जब जादू टूटा तब वह अपने साथ भानू की बीमारियों को भी दूर करता चला गया।

पर एक सवाल जो सबके मन में बना रहा और शायद उस जमाने से लेकर आजतक बना हुआ है कि उस डायन का क्या हुआ? क्या वह अब भी जीवित होगी? और क्या वह अब भी वही रहती होगी?

वैसे अब उस जंगल के पेड़ काटे जा चुके हैं। मगर वहाँ उस बडे़ इलाके में एक घर मौजूद है, परंतु वह कोई छोटी सी कुटिया नहीं, बल्कि एक आलीशान भवन है और उसमें एक बूढ़ी औरत रहा करती है, जो यदा-कदा ही अपने घर से बाहर आती है और अनजान लोगों से बातें करती है।

***

Ritu Raj

मेरा नाम ॠतु राज है और मैं आपका Magical Hindi Stories में स्वागत करता हूँ। मेरी कोशिश आप सभी पाठकों तक ऐसी नई और रोचक हिंदी कहानियाँ पहुँचाने की है, जिन्हें आप अवश्य पढ़ना चाहेंगे।

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