गेस्ट हाउस

मैं अक्सर भूतों, प्रेतों और चुड़ैलों का मज़ाक उड़ाया करता था। जब भी ऐसी कोई बात छिड़ती, तो मैं जाने-अनजाने में कुछ ऐसा कह जाता, जो शायद मुझे नहीं कहना चाहिए। मेरे लिए तो उनका अस्तित्व किस्से-कहानियों तक ही सीमित था। और फिर मेरे साथ कुछ ऐसा हुआ-

मैं एक सरकारी कर्मचारी हूँ। चूंकि मैं कृषि विभाग में काम करता हूँ, इसलिए मुझे आए दिन अलग-अलग गाँवों के चक्कर काटने पड़ते है। मेरा काम लोगों को नई-नई योजनाओं के बारे में बताना था और रुचि रखने वाले लोगों का उन योजनाओं में नामांकन करना था। मुझे निर्देश तो यही दिये जाते थे। मगर हम सब जानते है कि कागज़ी कामों में हमेशा देर हो जाती है। किसी के पास आधार कार्ड नहीं, तो किसी के पास राशन कार्ड नहीं। तो कई लोग ऐसे भी मिल जाते हैं जिनके पास ऐसा कोई भी दस्तावेज़ नहीं होता, जिससे वह खुद को इस देश का नागरिक साबित कर सके। ऐसे में देर होना तो लाज़मी है।

उन दिनों बारिश का मौसम था और मुझे दफ्तर के काम से हिमाचल के एक छोटे से गाँव में जान पड़ा। एक ऐसा गाँव जो भारत के नक्शे में भी नहीं दिखता। उम्मीद थी कि मैं शाम होते-होते घर लौट आऊँगा। क्योंकि वह गाँव मेरे शहर से चार घंटे की दूरी पर था। मैं दफ्तर की गाड़ी पर बैठा और फौरन वहाँ के लिए रवाना हो गया।

मैं हिमाचल के उस गाँव में पहले कभी नहीं गया था। मगर उससे जुड़े कई किस्से मुझे ज़ुबानी याद थे। ऐसा कहा जाता है कि वहाँ चुडैले रहा करती है। वे लोगों को बहला-फुसलाकर अपने वश में कर लेती हैं और फिर उन्हें मार डालती हैं। इसपर यक़ीन करना मुश्किल है, पर ऐसी बातें किसी के भी मन में संदेह पैदा करने के लिए काफी हैं।

जब मैं उस गाँव में पहुँचा, तब मुझे वहाँ कोई भी नजर नहीं आया। रास्ता सुनसान था मानो सदियों से उन रास्तों पर कोई न चला हो। कुछ लोग अपने घरों से मुझे चोरी-छिपे देख रहे थें और जब मैं उनसे बात करने के लिए उनकी तरफ बढ़ा, तब उन्होंने झट से अपनी खिड़कियाँ और दरवाज़े बंद कर लिए। सच में बड़ी अजीब बात थी। मैं काफी देर तक एक दुकान के बाहर बैठा किसी के नजर आने की प्रतीक्षा करता रहा। छोटे गाँवों में सरकारी काम ऐसे ही होता है। आप किसी भीड़ वाली जगह या फिर किसी दुकान के सामने बैठ जाते हैं और लोगों को योजनाओं के बारे में बताने लगते हैं। धीरे-धीरे अपने आप ही वहाँ भीड़ इक्कठा होनी शुरू हो जाती है। पर उस दिन वैसा कुछ भी नहीं हुआ। मुझे दूर-दूर तक कोई भी न दिखा। कुछ देर बाद मुझे भी थोड़ी चिंता होने लगी और उस गाँव से जुड़े डरावने किस्सों पर भरोसा होने लगा।

मैंने अपने दफ्तर में कॉल लगाकर बड़े साहब से बात करने की कोशिश की। तकरीबन दस-बारह कोशिशों के बाद जाकर उनसे बात हो पाई। खैर मैंने उन्हें उस गाँव की परिस्थिति समझाई, इस उम्मीद में कि वह मुझे फौरन लौट आने को कहेंगे। मगर बड़े साहब ने साफ और स्पष्ट लहज़े में कह दिया कि अपना काम खत्म करके ही लौटना। उन्हें उस गाँव से कम से कम 20 लोगों का कृषि योजना में नामांकन चाहिए था।

देखते-देखते शाम हो आई और अब-तक मुझे इंसान तो दूर, जानवर भी नजर नहीं आया था। दूसरी तरफ मुझे अपने रहने का भी बंदोबस्त करना था। आखिर मैं पूरी रात, वह भी बारिश के मौसम में सड़क पर तो नहीं रह सकता था।

मैंने उस गाँव का चप्पा-चप्पा छान मारा, मगर रहने और सिर छुपाने की जगह न मिली। मजबूरन मुझे वहाँ से लौटना पड़ा। मैंने सोचा कि आस-पास अगर कोई गेस्ट हाउस मिल जाता, तो यह रात कट जाती। फिर अगले दिन अपना काम खत्म करके अपने शहर लौट आता। अगर कल भी यही हाल रहा तो मैं निस्संदेह शहर लौट जाऊँगा। यही सोचता-सोचता मैं बारिश में अपनी गाड़ी चलाते हुए उस सुनसान रास्ते पर बढ़ा चला जा रहा था। तभी फटाक की ज़ोरदार आवाज़ हुई और मैं कार पर से नियंत्रण खो बैठा। मेरी कार तेजी से जंगलों में बढ़ी चली जा रही थी और फिर ज़ोरदार ढंग से पेड़ो से टकराकर रूकी। सौभाग्यवश मुझे चोट नहीं आई। मैं अपनी गाड़ी से बाहर आया। टायर पंचर हो गया था। मुझे बहुत गुस्सा आया।

“अच्छा होता कि मैं अपनी गाड़ी से यहाँ आया होता।” मैंने अपने आप से कहा।

इसी बीच मैंने दूर जंगल में एक हल्की सी रोशनी देखी। उधर जंगली जानवरों को भी मेरी मौजूदगी का एहसास हो गया था। शायद वह कोई भालू रहा होगा जिसकी आवाज़ मेरे कानों में पड़ी और मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मैं फौरन उस दिशा में बढ़ने लगा, जहाँ मुझे रोशनी नजर आ रही थी।

मैं जल्द ही वहाँ पहुँच गया। मुझे यह देखकर अच्छा लगा कि वह रोशनी एक गेस्ट हाउस से आ रही थी। पर भला जंगल के इतने भीतर गेस्ट हाउस कौन बनाएगा। जहाँ उसे मुख्य सड़क से कोई देख भी न सके। सचमें बड़ी हैरानी की बात थी। पर मैंने इस विषय में ज्यादा नहीं सोचा। मैंने इस बात पर भी ज्यादा गौर नहीं किया कि वह गेस्ट हाउस कितना भयानक दिखता था। मैं खुश था कि कम से कम मुझे इस वीरान जगह पर सिर छुपाने का आसरा मिल गया था और मैं इस अवसर को व्यर्थ के तर्कों और मनगढ़ंत बातों के चलते खोना नहीं चाहता था। बारिश भी अब तेज हो चुकी थी। मैं फौरन गेस्ट हाउस के भीतर गया।

मगर मेरे दरवाज़ा खोलने से पहले ही वह खुद-ब-खुद एक भयानक चरमराहट की आवाज़ के साथ खुल गया। खैर, मैं उस गेस्ट हाउस के अंदर गया। वहाँ एक बूढ़ा व्यक्ति काउंटर पर बैठा था। उसने मेरी तरफ देखा और फिर से अपने काम में जुट गया। दरअसल वह पुराने डाक टिकट को लिफाफों से निकालकर एक पन्ने पर चिपका रहा था। मुझे समझ में आ गया था कि उसे डाक टिकट इक्कठा करने का शौक था। खैर उसे अब भी मेरे वहाँ मौजूद होने से कोई फर्क पड़ता नहीं दिख रहा था। तो मैंने ही बातचीत शुरू की।

‘आज रात रुकने के लिए मुझे कमरा चाहिए। मैं कल सुबह ही यहाँ से चला जाऊँगा।’ मैंने कहा। मैं खुश था कि इतनी देर बाद मैं किसी से बात कर रहा था।

मगर उस बुजुर्ग ने कोई जवाब नहीं दिया। वह अपनी जगह से उठा और कमरे की चाबी मुझे थमाकर फिर से अपने काम में लग गया।

‘कितने पैसे हुए?’ मैंने पूछा।

कोई जवाब नहीं।

मुझे ताजे मसालों और स्वादिष्ट व्यंजनों की अच्छी खुशबू आ रही थी। ‘खाने में क्या है?’ मैंने पूछा।

उसने फौरन मुझे मेनू थमा दिया। मैंने अपने पसंद का खाना आर्डर किया और भोजन करने के बाद अपने कमरे में चला गया। कपड़े बदलकर मैं बिस्तर पर लेटा और न जाने कब मुझे नींद आ गई, मुझे इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं है।

टप…टप…टप…टप…टप की आवाज़ से मैं जागा। यह किस चीज की आवाज़ थी। फिर मैंने गौर किया कि यह दरअसल पानी के टपकने की आवाज़ थी, जो कि बाथरूम से आ रही थी। मैं उठकर बाथरूम की ओर बढ़ा। जब मेरी नजर खिड़की पर पड़ी। मैंने देखा कि एक अधेड़ उम्र की महिला, बाहर खड़ी मेरे कमरे की खिड़की को निहार रही थी। उसके हाथ में एक कौवा था, जो उससे अपना पीछा छुड़वाने के लिए बुरी तरह से फड़फड़ा रहा था। फिर मैंने देखा कि आस-पास अचानक ही धुंध इक्कठा होनी शुरू हो गई। फिर वह औरत मेरी तरफ देखते हुए मुस्कुराई और उस कौवे को पूरी ताकत से मेरी खिड़की की तरफ फेक दिया। कौवा खिड़की पर लगे काँच से टकराया और सीधा मेरे कमरे में आकर गिरा। उसके खून के छींटे मेरे शरीर पर पड़े और उसने वहीं तड़पते हुए अपना दम तोड़ दिया। इससे पहले मैं उस औरत से कुछ कह पाता वह गायब हो चुकी थी। मैं बाथरूम में गया और नल से गिरते पानी को बंद कर, जैसे ही बाहर आया, वह औरत अचानक मेरे सामने आ धमकी और दिल दहला देने वाली आवाज़ में चीखी। मैं वहीं गिर पड़ा और मेरी आँखें खुल गईं।  

मैं सपना देख रहा था। सच में भयानक सपना। उस वक्त तकरीबन एक बज रहे होंगे। मुझे प्यास लगी थी और कमरे में पीने का पानी नहीं था। मगर टप…टप…टप की आवाज़ बाथरूम से आ रही थी। मैं कमरे से बाहर आया और काउंटर की तरफ बढ़ा, जहाँ वह बूढ़ा मैनेजर बैठा हुआ था। न जाने क्यों मुझे थोड़ी बेचैनी हो रही थी और माथे से ढेर सारा पसीना आ रहा था। मैं उस लंबे अंधेरे गलियारे से होते हुए गेस्ट हाउस के लॉबी में अभी पहुँचा ही था कि तभी मेरी आँखों ने एक हैरतअंगेज़ दृश्य देखा। वह बूढ़ा मैनेजर मेरी आँखो के सामने ही दीवार के बीच से होते हुए गायब हो गया। नहीं यह कोई भ्रम नहीं था। वह सच में दीवार के बीच से ही गया था। मैं वहीं अपने दोनों घुटनों पर बैठ गया और उस दृश्य को याद करने लगा, जिसने अभी-अभी मेरे रोंगटे खड़े कर दिये थे। फिर एकाएक मुझे उस औरत की झलक मिली। वह काउंटर के पीछे मौजूद दरवाज़े में गई थी, जहाँ थोड़ी देर पहले मैंने उस बूढ़े को जाते देखा था। अब-तक तो मेरी प्यास कहाँ खो गई थी मुझे नहीं मालूम। गला सूखा था, मगर प्यास बूझ चुकी थी।

अच्छा होता कि मैं उसी पल वहाँ से भाग गया होता। मगर हम इंसानों के बारे में एक बात कही जाती है कि हमें जिस चीज से खतरा होता है, हम उससे दूर भागने के बजाय उसके पास ही जाकर सबक सीखते हैं। फिर चाहे इसमें हमारी जान ही क्यों न चली जाए। हमारी जिज्ञासा, हमें अक्सर उस ओर खींच लाती है।

खैर मैं उठा और काउंटर के पीछे मौजूद दरवाज़े की तरफ बढ़ने लगा। मैंने दरवाज़ा खोला। अंदर घोर अंधेरा था। मैंने काउंटर के पास जल रहे मोमबत्ती को उठाया और दरवाज़े से अंदर दाखिल हुआ। वहाँ कोई कमरा नहीं बल्कि एक लंबा गलियारा था। मैं आहिस्ता-आहिस्ता आगे बढ़ा। जब मैं उस दरवाज़े से कुछ दूर आ पहुँचा, तब मैंने अपने पीछे कदमों की आहट सुनी। मैं फौरन रूक गया, मगर पीछे मुड़कर देखने की हिम्मत नहीं हुई। फिर अपरिचित कदमों की आहट दो बार हुई और रूक गई। मैंने अपने गर्दन के पिछले हिस्से पर गर्म हवा के झोंके महसूस किये। मेरे पीछे जो भी था, वह मेरे बेहद करीब खड़ा था। आखिरकार मैं हिम्मत जुटाकर पीछे मुड़ा और अपनी जगह पर स्तब्ध खड़ा रह गया। वह वही बूढ़ी औरत थी, जिसे मैंने सपने में देखा था।

‘कौन हो तुम?’ मैंने घबराकर पूछा।

‘एक चुडैल।’ उसने जवाब दिया। ‘तुम मुझसे ही मिलना चाहते थे ना।’

मेरे पास इसका कोई उत्तर नहीं था। या शायद मैं कोई जवाब देने की स्थिति में नहीं था।

फिर एकाएक वह पूरा गलियारा रोशन हो उठा। वहाँ मौजूद सारी मोमबत्तियाँ जल उठी थीं।

‘अपने पीछे देखो?’ उसने आदेश दिया।

और मैंने वैसा ही किया। वह पूरा गलियारा मरे हुए लोगों की आत्माओं से भरा हुआ था।

‘अब तुम्हें भूत-प्रेत पर भी यकीन हो गया होगा।’ उसने कहा।

मैं फौरन वहाँ से बाहर की तरफ भागा। एक बार पीछे मुड़ने की हिम्मत हुई और उसी पल मैं धड़ाम से नीचे गिर पड़ा। मैंने उस चुडैल को मुस्कुराते हुए देखा और अगले ही क्षण उसके चेहरे को बदलते हुए भी। फिर धीरे-धीरे उसका पूरा शरीर बदलने लगा और अंततः वह पूरी तरह से एक काली बिल्ली में बदल गई।

वह बड़े आराम से मेरे पास चलकर आई और कहा-

‘मैं तुम्हें जिंदा जाने देती हूँ। मगर हमारी मुलाकात जल्द ही होगी। तुमने भूतों, प्रेतों और चुड़ैलों का काफी उपहास किया है। अब समय आ गया है कि तुम थोड़ा हमारे बारे में भी जान लो। जल्द ही मिलूँगी।’ और वह ओझल हो गई।

मैं खड़ा हुआ और जितनी तेज दौड़ सकता था, दौड़ता हुआ अपनी गाड़ी तक पहुँचा। मेरी कार ठीक हो चुकी थी। किसी ने पंचर टायर को बदल दिया था। शायद यह उसी चुड़ैल का काम होगा। मेरा सारा सामान भी पहले से ही गाड़ी में रखा जा चुका था और पानी की एक बोतल भी वहाँ पड़ी थी। खैर मैं वहाँ से किसी तरह अपनी जान बचा कर भागने में सफल रहा और सीधा अपने घर पहुँचकर रुका।

अभी उस घटना को बीते हुए दो साल भी नहीं हुए है और शायद इसीलिए मुझे वह भयानक किस्सा बार-बार याद आ जाता है। उस चुड़ैल का चेहरा और फिर उसका काली बिल्ली में बदलना, मैं अब भी नहीं भूल पाया हूँ। ऐसी घटनाओं को भूलने में ज्यादा समय लगता होगा। मुझे इस बारे में कुछ खास पता नहीं। मसला यह है कि मैं आज भी डरा हुआ हूँ। रात में होने वाली छोटी से छोटी आहट भी मुझे उस गेस्ट हाउस की याद दिला देता है, जहाँ उस रोज मैं ठहरा था।

जारी है…  

Ritu Raj

मेरा नाम ॠतु राज है और मैं आपका Magical Hindi Stories में स्वागत करता हूँ। मेरी कोशिश आप सभी पाठकों तक ऐसी नई और रोचक हिंदी कहानियाँ पहुँचाने की है, जिन्हें आप अवश्य पढ़ना चाहेंगे।

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published.

%d bloggers like this: