गडेरिया और जादुई खेतों के फसल

एक समय की बात है, एक छोटे से गाँव में एक पहलवान गडेरिया रहा करता था। उसकी ताकत से पूरा गाँव काँपा करता था। उसके पास पचास भेड़ें थी। हर वर्ष वह उन भेड़ों की खाल बेचकर ढेरों पैसे कमा लिया करता था। इसलिए उसे अपने भेड़ों के हट्टे-कट्टे बने रहने की बड़ी चिंता होती थी। वह प्रतिदिन उन भेड़ों को हरे घास के मैदानों में चराने ले जाया करता था। वहाँ आसपास ढ़ेर सारे खेत थें, जिसमें किसान फसले उपजाया करते थें। शाम को जब सभी किसान अपना-अपना काम खत्म करके घर लौट जाते, तब वह चोरी-छुपे अपने भेड़ों को उनके खेतों में चरने के लिए छोड़ दिया करता था। कुछ घंटो में वे इतना खा लेते कि अगले दिन उन भेड़ों को कुछ खाने की जरूरत न महसूस होती। फिर भी वह गडेरिया प्रतिदिन भेड़ों को चराने के लिए ले जाया करता था। खेतों में उगे फसलों को खाकर गडेरिये के भेड़ पूरे साल मोटे-ताजे और स्वस्थ बने रहते और साथ ही साथ अपने ऊपर ढेरों खाल जमा कर लिया करते थे। दिन बीतते गए और वह गडेरिया भेड़ों की खाल बेचकर अमीर बनता गया। वही दूसरी तरफ उसे उन किसानों की मुसीबतों से कोई लेना देना नहीं था। जो पूरे साल खेतों में मेहनत करके फसल उपजाया करते थें और उसे गडेरिये के भेड़ नष्ट कर दिया करते थें। किसानों ने कई बार उसे समझाने की कोशिश की कि वह अपने भेड़ो को खेतों में जाने से रोके। मगर उसके कानों पर जूं तक न रेंगती। वह तो उनकी बातों को ऐसे झटक दिया करता, जैसे हम अपने कान के पास भिनभिनाते मच्छर को झटक दिया करते है। हर बार वह किसानों की बातों को यह कहकर टाल दिया करता कि – ‘ये तो मासूम जानवर हैं। इन्हें भला सीमाओं का क्या ज्ञान। मेरी आँख लग जाती है और ये तुम्हारे खेतों में घुस जाया करते है। मुझे माफ करना। अगली बार मैं कोशिश करूँगा कि ऐसा न हो।’ और फिर वह अपने मजबूत बाजुओं को ऊपर-नीचे करता और निर्बल किसान समझ जाया करते कि अब आगे कुछ ना ही कहने में समझदारी है। भला किसमें इतनी हिम्मत थी कि वह उस बलशाली गडेरिया से लड़कर अपनी बात मनवा लेता।

ऐसी ही एक शाम वह गडेरिया किसानों के वापिस घर लौटने की प्रतीक्षा कर रहा था। सूरज डूबने को था, मगर किसान अब-तक अपना खेत छोड़कर घर नहीं गए थें। गडेरिया समझ गया था कि वे किसान अवश्य उसके भेड़ों से अपने खेतों की रक्षा करने के लिए रुके हुए थे। तब उसने एक तरकीब सोची। वह चुपचाप अपने भेड़ो को लेकर वहाँ से चला गया और कुछ दूर जाकर पर्वतों के पीछे छुप गया। वह तकरीबन घंटे-दो घंटे वहाँ छिपा रहा। जब सूरज पूरी तरह से डूब गया और आसमान में तारे टिमटिमाने लगे, तब वह पुन: चोरी-छुपे खेतों की तरफ लौटा। मगर उसे तब भी खेतों में से आवाजें आती सुनाई दी और रह रहकर उसे एक दो किसान नजर आ जाया करते। उस रात उसके भेड़ों को अच्छा भोजन नसीब न हुआ और गडेरिये को वापिस अपने घर लौट जाना पड़ा। उसे बहुत गुस्सा आया। वह मन ही मन किसानों को भला बुरा कहता हुआ वहाँ से चला गया।

उस दिन के बाद से हर शाम ऐसा ही होता। वह गडेरिया देर तक प्रतीक्षा करता, मगर किसान अपने घर जाने का नाम न लेते। किसानों ने तो जैसे वहीं खूंटा गाड़ लिया था। गडेरिये के सामने एक और समस्या यह थी कि अब उसके भेड़ घास-फूस खाने में नखरे दिखाने लगे थें। उन्हें तो खेतों में उगे अनाज खाने की आदत पड़ चुकी थी। दिन बीतते गए और गडेरिये के भेड़ पतले और कमजोर पड़ते गए। उनके शरीर पर इतनी खाल न जमा हो पाती, जिसे बेचकर वह कुछ पैसे कमा ले।

एक रोज सूरज डूबने के बाद प्रतीक्षा करते रहने पर भी किसान अपने घर न लौटे, तब उससे रहा नहीं गया और वह किसानों से बात करने के लिए खेतों में चला गया। ऊँचे-ऊँचे फसलों की वजह से उसे कोई नजर नहीं आ रहा था फिर भी वह उस ओर बढ़ता गया जहाँ से आवाज़ें आ रहीं थीं। वह काफी देर तक खेतों में इधर-उधर भटकता रहा और वहाँ से आती आवाज़ों का पीछा करता रहा, मगर उसे कोई भी नजर नहीं आया।

अब गडेरिये को डर लगने लगा था। जाने वे आवाज़ें कहाँ से आ रही थीं। दूसरी तरफ उसे खेत से बाहर जाने का भी रास्ता नहीं मिल रहा था। इस दौरान इधर-उधर से आवाज़ें आनी जारी रहीं। हतोत्साहित होकर वह गडेरिया वहीं बैठ गया और जोर-जोर से रोने लगा। मेरी जान बख्श दो… मेरी जान बख्श दो… मेरी जान बख्श दो। प्रभु मेरी रक्षा करो।

तभी अचानक फसलों के बीच से आवाज़ आई- “मैं इन जादुई खेतों में रहने वाला फसल बोल रहा हूँ। तुमने अपने स्वार्थ के खातिर किसानों के फसलों को नष्ट किया है। उनकी मेहनत को बर्बाद किया है। उनके मना करने पर भी तुमने अपने भेड़ो को इन खेतों में चरने के लिए छोड़ा है। इसलिए अब तुम्हारी सजा की बारी है।”

अगले ही पल गडेरिये के दोनों पैर मिट्टी में धँसने लगे और वह रो-रोकर अपनी जान बख्शने की भीख मांगता रहा। जब वह गर्दन तक मिट्टी के अंदर धँस चुका था, तब उस जादुई खेत के फ़सलों ने कहा “हम तुम्हें तभी जाने देंगे, जब तुम यह वादा करोगे कि कभी चोरी-छुपे अपने भेड़ों को किसानों के खेतों में नहीं भेजोगे। और अपनी ताकत का गलत इस्तेमाल नहीं करोगे। मेहनत और ईमानदारी से पैसे कमाओगे और जितना मिले उसमें संतोष करोगे।”

‘मुझे तुम्हारी शर्तें मंज़ूर है। कृपया कर मेरी जान बख्श दो और मुझे जाने दो।’ गडेरिये ने कहा।

फिर उस जादुई खेतों के फ़सलों ने गडेरिये को बाहर निकाला और जाने दिया। उस दिन के बाद से वह कभी अपने भेड़ों को किसानों की खेतों में नहीं जाने दिया करता। धीरे-धीरे उन भेड़ों को फिर से घास खाने की आदत पड़ गई और वह उनकी खाल बेचकर इतने पैसे कमा लेता था, जिससे कि वह आसानी से अपना गुज़र-बसर कर लेता था। उधर सभी किसान, गडेरिये में आए इस बदलाव से बेहद खुश थें।

निष्कर्ष-

अगर हम ईमानदारी से काम करते हैं, तब हम कम पैसों में भी शांति और सुकून भरी जिंदगी जी सकते हैं। साथ ही साथ दूसरों के नज़रों में भी हम अच्छे बन जाते हैं। संतोष करने से ही मन की शांति प्राप्त होती है, जो हमें परम सूख का अनुभव करवाती है।

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Ritu Raj

मेरा नाम ॠतु राज है और मैं आपका Magical Hindi Stories में स्वागत करता हूँ। मेरी कोशिश आप सभी पाठकों तक ऐसी नई और रोचक हिंदी कहानियाँ पहुँचाने की है, जिन्हें आप अवश्य पढ़ना चाहेंगे।

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