डायन से शादी

घटना 18वीं सदी के अंत की है। तब हमारा देश एक साथ कई समस्याओं से जूझ रहा था। अंग्रेजों और जमींदारों की हुकूमत क्रूरता के नए अध्याय लिखते जा रहे थे और गरीब तबके के लोग दर-दर ठोकर खाने पर मजबूर थें। साहूकारों के कर्ज में डूबे ये गरीब बड़ी ही दयनीय जिंदगी जीया करते थें। चूल्हों में जलाने को लकड़ियाँ तो होती, मगर अनाज ना होता जिससे वे अपनी पेट की आग बुझा पाते। अपना ज़मीन होते हुए भी उन्हें जमींदारों के भरोसे रहकर खेती करनी पड़ती। आखिर बीजों और हल चलाने वाले बैलों का खर्च जमींदार ही तो उठाते थें। और फिर इसी कर्ज में वे गरीब और डूब जाया करते थें। पहले का कर्ज खेत में तैयार हुए फ़सलों को बेचकर चुकाना पड़ता था। फिर भी इतने पैसे नहीं जमा कर पाते, जिससे कि वे जमींदारों और साहूकारों का सारा कर्ज उतार सके। ऐसे में धीरे-धीरे वे अपनी ज़मीन से हाथ धो बैठते। फिर उनके पास गरीबी और लाचारी के सिवा कुछ भी नहीं बचता था।

इन्हीं हालातों में एक गाँव में एक किसान और उसका परिवार रहा करता था। साहू और उसकी पत्नी नपला की उम्र लगभग 50-55 की होगी। वे जात से लोहार थें और कभी उनके पास भी खेती के लिए अपना ज़मीन हुआ करता था। जो कि अब गाँव के जमींदार के भेट चढ़ चुकी थी। दोनों कर्ज में इतने डूबे हुए थें कि अब उनके पास एक आना भी न बचा था, जिससे की वे अपने लिए भोजन का प्रबंध कर सकें। उनकी मुसीबत तब और बढ़ गई, जब उनका इकलौता बेटा स्वामी जो बारह साल की उम्र में ही जमींदार के खौफ से घर छोड़कर भाग खड़ा हुआ था, अचानक से पूरे 13 साल बाद साहू के दरवाज़े पर आ धमका और उसने अपना परिचय दिया-

“पिता जी मैं स्वामी आपका बेटा।”

साहू का मन तो हुआ कि वह उसे फौरन गले से लगा ले। मगर एक दृश्य ने उसे रोक लिया।

“स्वामी, तेरे साथ यह औरत कौन है।” साहू ने पूछा।

स्वामी थोड़ा हिचकिचाया और जैसे-तैसे हिम्मत समेटकर बोला “इसका नाम बिमला है पिता जी। यह मेरी पत्नी है।”

“तूने शादी कर ली।” साहू बोला और फिर एक लंबा विराम। वैसे भी अब कुछ कहने का क्या फायदा था। आखिर उनकी शादी हो चुकी थी। बहरहाल वह मन ही मन सोचता रहा कि भला कैसे स्वामी जैसे अनपढ़ गरीब को इतनी सुंदर कन्या मिल गई। देखने से वह किसी राज घराने की नजर आती थी, ऊपर से उसकी वेष-भूषा, कपड़े-लत्ते और उसके गले में सजा इतना महँगा हार, यह सब देखकर साहू सचमें हैरान था। इतने में स्वामी की माँ नपला बाहर आई। उसने एक झटके में अपने बेटे को पहचान लिया और रोते-रोते उसके गले से जा लगी। नपला को इस बात से कोई एतराज न था कि उसके बेटे ने उन्हें बिना बताए शादी कर ली थी। वह तो स्वामी के वापिस लौट आने से ही संतोष का अनुभव कर रही थी। कम से कम उसका बेटा कुछ काम करके घर में चार आने तो ले आएगा और वे दिन में एक बार पेट भर के खा सकेंगे। भले ही वह सूखी रोटी ही क्यों न हो।

अब स्वामी को घर लौटे हुए पूरे एक साल हो चुके थें। उसके चलते, साहू और उसकी पत्नी का जीवन थोड़ा आसान जरूर हो गया था। जमींदार के खेतों में काम करके उसे इतने पैसे मिल जाते थें, जिससे वह आसानी से अपने परिवार का खर्च उठा पाता था। मगर जमींदार के खेतों में काम करना इतना आसान न था। दिन भर कड़ी धूप में खटने के बाद जाकर कुछ आने का जुगाड़ हो पाता था। ऊपर से जमींदार के चमचों की कड़वी बातें और थोड़ी मार भी सहनी पड़ती थी। स्वामी को यह सब बुरा तो लगता, मगर परिवार के लिए यह सब कुछ सहने में उसे कोई एतराज न था। खैर इतनी कड़ी मेहनत के बाद, शाम को खेतों से घर लौटते हुए, वह थोड़े पैसे ताड़ी पीने में खर्च कर देता, जिससे उसकी थकान कम हो जाती और वह रात भर अच्छी नींद में सो पाता था।

इन बीते एक साल में घर का माहौल काफी अच्छा हो गया था, मगर साहू की पत्नी नपला कुछ चिंतित रहने लगी थी। न जाने क्यों वह स्वामी की पत्नी (बिमला) के प्रति थोड़ा सजग रहा करती थी। दरअसल बात ही कुछ ऐसी थी, जिसने नपला को थोड़ा सजग बना दिया था।

एक रात जब घर के सभी सदस्य सो रहे थें, तब नपला की नींद बर्तन गिरने की आवाज़ से खुल गई। पहले तो उसने सोचा कि शायद रसोईघर में बिल्ली घुस आई होगी और वह फौरन अपने खटिये से नीचे उतरकर रसोईघर की तरफ बढ़ी। उसके पास दीया या लालटेन जलाने का वक्त नहीं था। अगर उसने थोड़ी देर और कर दी तब बिल्ली पतीले में रखा सारा दूध सफाचट कर जाएगी और वे यदा-कदा नसीब होने वाले दूध से भी हाथ धो बैठेंगे। इसी जल्दबाज़ी में वह अंधेरे में ही रसोईघर में दाखिल हुई। तभी उसने एक हैरतअंगेज दृश्य देखा। दो चमकती आँखें ज़मीन से सटी हुई थीं। नपला ने सोचा कि वह किसी बिल्ली की आँखें होगी। मगर जल्दी ही उसका यह भ्रम भी टूट गया। वे आँखें जो अब-तक ज़मीन से चिपकी हुईं थीं, अचानक ऊपर उठने लगी। उसकी लंबाई धीरे-धीरे बढ़ती ही जा रही थी और झोपड़ी के छत को छूकर रूकी। नपला चीखते-चिल्लाते रसोईघर से बाहर भागी। वह फौरन अपने कमरे में पहुँची और साहू को जगाने का प्रयास करने लगी। मगर साहू ऐसे सोया रहा जैसे उसके शरीर में प्राण ही न हो। फिर वह स्वामी के कमरे में गई और स्वामी को जगाना चाहा, परंतु वह भी न उठा। फिर नपला ने बिमला को आवाज़ लगाई। मगर वह तो अपने बिस्तर पर थी ही नहीं।

“जाने वह कहाँ गई है?” नपला ने मन ही मन सोचा।

वह स्वामी के कमरे से बाहर आई। नपला एक बार और रसोईघर में जाकर देखना चाहती थी कि आखिर वह क्या बला थी, मगर उसकी हिम्मत न हुई। तभी उसने घर के पिछले आंगन में किसी के हँसने की आवाज़ सुनी। नपला आहिस्ते-आहिस्ते आंगन की ओर बढ़ी और उसने जो देखा उससे उसकी पैरों के नीचे की ज़मीन खिसकती चली गई। उसकी बहू बिमला खुले बाल और नग्न अवस्था में वहाँ बैठी हुई थी। उसके हाथों में एक दूध का पतीला था और आस-पास चालीस-पचास काली बिल्लियाँ घूम रहीं थीं। वह उन्हें उस बर्तन से दूध पिला रही थीं। जब दूध खत्म हो गया, तब उसने एक-एक कर सभी बिल्लियों को अपना दूध पिलाना शुरू कर दिया। यह देखकर नपला के होश उड़ गए। वह जानती थी कि ऐसा डायन ही किया करती हैं। वह बिना कोई आवाज़ किया अपने कमरे में लौट आई। नपला ने अंदाजा लगाया कि बिमला ने अवश्य साहू और स्वामी के खाने में कुछ मिलाया होगा या फिर किसी तरह का जादू-टोना किया होगा, जिससे उनकी नींद नहीं खुली। फिर उसे रह-रहकर स्वामी की चिंता होती। जाने रात गए वह डायन उसके साथ क्या करती होगी। उस दिन के बाद से नपला ने कई बार बिमला को ऐसा करते देखा, मगर डर के मारे उससे पूछने की हिम्मत न हुई।

उधर नपला के चेहरे के हाव-भाव को देखकर बिमला को भी थोड़ा शक अवश्य हो गया था। अब माहौल गंभीर होता जा रहा था। बिमला से जुड़ी यह बात कुछ ऐसी थी कि वह चाहकर भी अपने पति या बेटे को नहीं बता सकती थी। कहीं स्वामी नाराज़ हो गया, तब घर में जो भी पैसे आ रहे हैं वह भी हाथ से चला जाएगा।

ऐसी ही एक रात उसने बिमला को घर के पिछले आंगन में जाते देखा। थोड़ी ही देर में उसके पीछे स्वामी भी जाता दिखाई दिया। नपला ने हल्की आवाज़ देकर स्वामी को रोकना चाहा मगर वह नहीं रुका। ऐसा लग रहा था मानो वह नींद में चल रहा हो। नपला भी चुपचाप उनके पीछे चल पड़ी। उनसे देखा कि बिमला ने चाकू से स्वामी के हाथ को काटा और उसके खून से एक गोल घेरा बनाकर और फिर उसके अंदर जाकर बैठ गई। इसके बाद उसने अजीबोगरीब मंत्रों का उच्चारण शुरू कर दिया, जिससे उसका शरीर हवा में उठने लगा। जब वह पूरी तरह से हवा में खड़ी हो गई, तब नपला ने देखा कि उसके पैर पीछे की तरफ मुड़ने लगे। जब वे पूरी तरह से पीछे मुड़ गए, तब वह धीरे-धीरे नीचे उतर आई और डरावने ढंग से चलने लगी।

उसने कहा ‘हे शैतानों के राजा मैंने डायनों की एक और सिद्धि प्राप्त कर ली है। अब मेरे भी पांव अन्य डायनों की तरह उलटे हो सकते हैं। इसका मतलब है कि मैं अब लोगों को अपनी मर्जी से और बेहद सरलता से उलटे-सीधे विचारों में फसाकर अपने वश में कर सकती हूँ।’

यह देखकर नपला इतना ज्यादा डर गई कि उसकी तबियत खराब हो गई और वह कई दिनों तक खटिये पर ही पड़ी रही।

बहरहाल घर के बाहर का माहौल भी डर और रहस्यों से भरा हुआ था। असल में बात यह थी कि बीते एक साल में जमींदार के पच्चीस नौकरों को किसी ने मार डाला था। उन सभी की मौत गला रेतकर की गई थी। एक और संयोग की बात यह थी कि जिस भी नौकर ने स्वामी को डाटा या फिर मारा था, वे अब जीवित नहीं बचे थें। इस बात से स्वयं स्वामी भी हैरान था।

एक रोज स्वामी को किसी काम से शहर जाना पड़ गया। शाम को शहर से वापिस लौटते-लौटते रात हो गई। तकरीबन बारह या एक बजे वह अपने गाँव के सीमा में दाखिल हुआ। यहाँ से उसके पास चुनने को दो रास्ते थें। एक छोटा रास्ता जंगल से होते हुए उसके घर की ओर जाता था। दूसरी तरफ कच्ची सड़क वाला रास्ता, जिससे होकर जाने का मतलब था कि उसे एक और घंटा अपने घर पहुँचने में लग जाता। फिर भी यह रास्ता सुरक्षित था। क्योंकि इस रास्ते पर वह जंगली जानवरों से बचा रह सकता था।

खैर स्वामी को घर पहुँचने की जल्दी थी और इसीलिए उसने जंगल से होकर जाने का फैसला किया। उसके पैर तेजी से चल रहे थें। वह किसी भी कीमत पर रूकना नहीं चाहता था। बीच-बीच में जंगली जानवरों के चिल्लाने की आवाजें आती रहीं। अभी वह आधा रास्ता ही तय कर पाया था कि तभी उसकी नज़रों ने एक हैरतअंगेज दृश्य देखा-

एक औरत बिना वस्त्र के पीपल के पेड़ के नीचे बैठी हुई थी और उसे चारों तरफ से बिल्लियों ने घेर रखा था। उस औरत के हाथ में एक नवजात शिशु था। स्वामी वहीं छुप कर उस महिला को देखने लगा। जब उस औरत ने अजीब से डरावने मंत्रों का उच्चारण शुरू किया, तब स्वामी को ऐसा लगा जैसे उसके कान का परदा फट जाएगा। वह नवजात शिशु भी जोर-जोर से रोने लगा। थोड़ी ही देर में जब चाँद ठीक उनके सिर के ऊपर चढ़ आया, तब उस महिला ने पास ही रखे अपने कपड़ों में से चाकू निकालकर, उस शिशु के गर्दन को आहिस्ते-आहिस्ते रेतना शुरू कर दिया। वह नया जन्मा बालक एक बार रोया और फिर शांत हो गया। उस औरत ने सारा खून एक पतीले में जमा कर लिया और गरजते हुए बोली ‘ओ शैतान यहाँ आकर यह भेट स्वीकार कर… ओ शैतान मेरी भेट स्वीकार कर… ओ शैतान मेरी भेट स्वीकार कर!

उसने ऐसा तीन बार कहा और न जाने कहाँ से एक शैतान बाहर निकल आया। वह दिखने में लंबा और शक्तिशाली था। उस औरत ने उसके कदमों तले मरे हुए शिशु का खून चढ़ाया और अपने घुटनों के बल उसके पास बैठ गई। शैतान ने सारा खून पीकर उस औरत से कहा ‘मुझे तेरी भेट स्वीकार है, माँग क्या चाहिए तुझे।’

‘मुझे इतनी शक्तियाँ चाहिए, जिससे मैं किसी को भी अपनी ऊँगलियों पर नचा सकूँ।’ औरत ने कहा।

वह शैतान मुस्कुराया और बोला ‘ठीक है। मैं तेरी इच्छा पूरी करता हूँ। मगर एक शर्त है।’

‘कैसी शर्त?’ औरत ने पूछा।

‘यही कि तुझे हर साल, आज ही के दिन एक नवजात शिशु की बलि देनी होगी। अगर तूने ऐसा नहीं किया तो फिर तेरी शक्ति कमजोर पड़ जाएगी। और फिर हमेशा-हमेशा के लिए नष्ट हो जाएगी।’ शैतान ने कहा।

‘मुझे यह शर्त मंज़ूर है।’ औरत बोली।

इसके बाद वह शैतान गायब हो गया। मगर स्वामी अब भी वहाँ था। उसे यकीन हो गया था कि जमींदार के नौकरों को भी इसी ने मारा होगा। इसी बीच स्वामी ने उस औरत का चेहरा देखा। वह यह देखकर दंग रह गया कि वह औरत और कोई नहीं बल्कि बिमला थी। वह फौरन मुड़ा और अपने घर की तरफ दौड़ लगा दी। वह किसी भी तरह बिमला से पहले घर पहुँचना चाहता था। तकरीबन दस मिनट तक लगातार दौड़ते रहने के बाद स्वामी अपने घर पहुँचा और उसने दरवाज़े पर दस्तक दी।

उसकी माँ ने दरवाज़ा खोला। स्वामी ने हाँफ्ते-हाँफ्ते अपनी माँ को सब कुछ बताया। उसकी बातें सुनकर नपला का शक यकीन में बदल गया। उसने भी स्वामी को बिल्लियों को दूध पिलाने वाली बात बताई।

‘तो अब हम क्या करें?’ स्वामी ने पूछा।

‘इसमें इतना सोचना क्या है! हम उसे घर से बाहर निकाल देंगे।’ साहू ने कहा। वह काफी देर से चुपचाप उनदोनों की बात सुन रहा था।

इसी बीच घर के मुख्य दरवाज़े पर दस्तक हुई। नपला, साहू और स्वामी की तो जैसे सांसे ही अटक गई। स्वामी ने डरते-डरते दरवाज़ा खोला। उसे यह देखकर हैरानी हुई कि बाहर बिमला नहीं बल्कि जमींदार का चौकीदार खड़ा था।

‘क्या बात है भीमा, इतनी रात गए यहाँ कैसे आना हुआ?’ साहू ने पूछा।

‘मलिक के तीसरी पत्नी ने परसों रात ही एक बच्चे को जन्म दिया था और आज रात कोई उसे चुराकर ले गया। कुछ लोगों ने बताया कि उन्होंने किसी औरत को बच्चे के साथ तुम्हारे ही घर में दाखिल होते देखा है। इसलिए मुझे घर की तलाशी लेनी होगी।’ चौकीदार ने कहा।

इससे पहले कोई उन्हें रोकने की कोशिश करता या फिर मना कर पाता भीमा अपने चार साथियों के साथ घर के अंदर घुस आया और सभी कमरो की छान-बिन शुरू कर दी। हालांकि अंदर उन्हें जमींदार का बेटा तो न मिला, मगर उनके हाथ एक सबूत अवश्य लग गया था।

भीमा ने कड़क लहज़े में पूछा ‘तेरी पत्नी कहाँ है? कहीं नजर नहीं आ रही!’

कोई जवाब न पाकर उनका शक यकीन में बदल गया और वे उन तीनों को जमींदार के पास ले गया।

छुपाने का कोई फायदा न था। उन्होंने जमींदार को सब कुछ सच-सच बता दिया। वे जानते थें कि इन सभी घटनाओं में उनका जरा भी दोष नहीं था। अगर ईश्वर की इच्छा हुई, तो उनकी जान बच जाएगी। न जाने क्यों जमींदार को उनपर दया आ गई और उन्होंने उन तीनों की जान बख्श दी। मगर उन्हें उस गाँव से निकाल दिया गया।

गाँव छोड़कर जाते हुए साहू और नपला के मन में एक ही बात चल रही थी। भला कैसे स्वामी की मुलाकात उस डायन से हो गई और उसने उससे शादी कर ली।

इसका जवाब देते हुए स्वामी बोला ‘मैं पहले जहाँ रहा करता था, वहाँ से कुछ ही दूरी पर एक घना जंगल था। उसी जंगल में मैं पहली बार बिमला से मिला था। उसने मुझे देखते ही मुझसे शादी करने को कहा। वह इतनी सुंदर थी कि मैं उसे मना नहीं कर पाया। शादी के पहले दिन उसने मुझसे कहा था कि मुझे वापिस अपने गाँव लौट जाना चाहिए। और वहीं कुछ काम करना चाहिए। उसने मुझसे यह भी कहा था कि मुझे किसी से डरने की आवश्यकता नहीं है। वह जब-तक मेरे साथ रहेगी, मेरे विषय में बुरा सोचने वाले लोगों से मेरी रक्षा करेगी। मैं तब उसकी बातों को नहीं समझ पाया था, मगर आज वे सारी बातें स्पष्ट हैं। मैंने एक डायन से शादी कर ली थी।’

खैर, उस दिन के बाद से बिमला की कोई खबर नहीं मिली। पर जैसा हम सभी जानते हैं कि नवजात बच्चों की बलि की खबर हमें आए दिन मिलती रहती है। तो क्या ऐसी घटनाओं को हम जादू-टोना और डायनों से जोड़ सकते है?

***

Ritu Raj

मेरा नाम ॠतु राज है और मैं आपका Magical Hindi Stories में स्वागत करता हूँ। मेरी कोशिश आप सभी पाठकों तक ऐसी नई और रोचक हिंदी कहानियाँ पहुँचाने की है, जिन्हें आप अवश्य पढ़ना चाहेंगे।

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