1.भूत-प्रेत कहाँ रहते हैं?

अगर आपको गेस्ट हाउस वाली घटना याद नहीं तो मैं आप सभी से आग्रह करूँगा कि आप उसे पढ़ लें।

गेस्ट हाउस वाली घटना को बीते हुए अब दो साल हो चुके है। और जैसा कि उस चुडैल ने कहा था कि “हमारी मुलाकात जल्द ही होगी”, वैसा अब-तक कुछ नहीं हुआ है। मगर उस घटना ने मेरे ऊपर गहरा प्रभाव डाला है। हर रात सोने से पहले गेस्ट हाउस का वह पूरा दृश्य मेरी आँखें के सामने ऐसे कौंध जाता है, मानो मैं उस पल भी उन दृश्यों को देख रहा हूँ। अब मेरे भीतर भूतों-प्रेतों और चुड़ैलों का उपहास करने की हिम्मत नहीं बची है और हर-पल उनसे सामना होने का डर सताता रहता है। अच्छा होता कि वे मेरे सामने आ ही जाते, फिर जो होता वो देख लिया जाता। संभव है कि मैं आजकल इसी सोच पर जी रहा हूँ। और यह खुद को बहलाने का कोई अच्छा ख्याल नहीं है।

आज की शाम थोड़ी शुष्क है। हवाएँ रूकी हुई हैं और बादलों ने सारा आसमान घेर रखा है। ऊपर से इस घने अंधेरे से ऐसा लगता है जैसे आसमान का कोई वजूद ही नहीं बचा है। रह-रहकर थोड़ी बिजली की चमक आती परंतु वह भी बगैर किसी आवाज़ के। मैं यह सब अपनी बालकनी में बैठा-बैठा देख रहा था। जब उसी पल मैंने आसमान में कुछ हैरतअंगेज चीज देखी। एक सफेद साया बादलों के बीच से निकल कर बाहर आया। मैं अपनी कुर्सी पर पीछे की ओर झुका हुआ था। वह इतनी तेजी से मेरी तरफ बढ़ा कि मैं पीछे गिर पड़ा। वह किसी तरह का भूत ही था जो अभी-अभी बादलों के बीच से होते हुए मेरी बाल्कनी में घुस आया था और वह भी ठीक मेरे चेहरे के सामने आँखों में आँखें डाले खड़ा था। वह मेरे इतने पास खड़ा था कि मैं अब-तक उसे ठीक से नहीं देख पाया था। सच पूछो तो मुझे डर नहीं लग रहा था। आप डर का अनुभव तभी करते हैं जब आपसे कोई अपरिचित चीज छुप रही होती है। पर जब वो आपके सामने आ जाए तब आपका दिमाग डर से हटकर परिणाम के बारे में सोचने लगता है कि जाने आगे क्या होगा। मैं भी कुछ ऐसा ही अनुभव कर रहा था।

फिर वह चीज पीछे हटी और मैं उसे ठीक से देख पाया। उसका फीका और गोल चेहरा इतना सफेद था कि वह तेज धूप में हमें कभी नजर नहीं आ सकता था। ऊपर से उसके लगभग पारदर्शी शरीर को देखकर मैं अपने भीतर ठंड और सिहरन महसूस करने लगा था। शायद इसे डर कहते हैं। धीरे-धीरे उसका चमकता शरीर फीका पड़ता गया और मेरी आँखें उसे और अच्छे से देखपाने लगी। सच पूछो, अगर मैं इसे पहले नहीं देख रहा होता तब तो मैं अवश्य इतना नहीं डरा होता, जितना अभी डरा हुआ हूँ। यह भूत देखने में इतना भी डरावना नहीं था। खैर मैं अब-तक ज़मीन पर गिरा पड़ा था, और उसने मेरी तरफ हाथ बढ़ाया

“उठो।” उसने कहा। उसकी आवाज़ भी साधारण थी। कुछ भी डरने जैसा नहीं था।

मैंने उसका हाथ पकड़ना चाहा, मगर मेरे हाथ उसके हाथ के आर-पार चले गए। फिर भी जैसे-तैसे मैं उठा।

उसने कहा “तुम्हें हमारा वादा तो याद ही होगा। हम तुमसे मिलने वाले थें।”

‘हाँ।’ मैंने उत्तर दिया। ‘हम से तुम्हारा क्या मतलब है? तुमलोग कितने हो जो मुझसे मिलने वाले हो?’

‘हम से मैं अपने-आप को ही संबोधित कर रहा था। उस चुड़ैल ने मुझे ज़िम्मेदारी सौंपी है कि मैं तुम्हें अपनी दुनिया के बारे में बताऊँ।’

‘क्या वह चुड़ैल सर्वोपरि है जो तुम उसकी बात मान रहे हो?’ मैंने प्रश्न किया।

‘सर्वोपरि क्या होता है यह तुम जानो। अभी के लिए तुम इसे ही सत्य मान लो। हमारी मुलाकात अब समय-समय पर होती रहेगी और मैं तुम्हें ढेरों बातें बताने वाला हूँ। तुम्हें अपने प्रश्न का उत्तर इसी दौरान मिल जाएगा।’ उसने जवाब दिया।

‘प्रश्न तुम्हारे और उत्तर मेरे। पूछो क्या पूछना है।’ उसने कहा।

‘आप भूत है या प्रेत?’ मैंने अपने भीतर से सारे डर को हटाकर प्रश्न किया।

‘भूत या प्रेत में बहुत सी समानताएं होती हैं। फिर भी ये दोनों एक दूसरे से अलग होते है। जब तक किसी मृत व्यक्ति या जानवर की आत्मा जीवित इंसान से नहीं मिलती, तब तक उन्हें भूत कहा जाता है, परंतु एक बार जीवित प्राणी से संपर्क करने के बाद वे प्रेत बन जाते हैं और प्रेत नुकसान पहुँचा सकते हैं। क्योंकि वे भूतों के विपरीत चीजों को छूने और बात करने की योग्यता रखते हैं। जब्कि भूत केवल सपने दिखाकर ही अपनी बात कह सकते है।

‘प्रेत कैसे चीजों को छू या उठा सकते हैं?’ मैंने दूसरा प्रश्न किया।

मरने के बाद आत्माओं की इच्छा शक्ति कमजोर हो जाती है। वे बहुत थोड़ा ही सोच पाते हैं। मानो अगर किसी की मृत्यु काम करते-करते हो गई, तब वह स्वयं को हमेशा-हमेशा के लिए वही काम करता हुआ पाएगा। उन्हें तो यह भी ज्ञात नहीं होता कि वे मर चुके है। मगर जिनको यह एहसास हो जाता है कि वे एक ही जगह पर फसे हुए हैं, तब वे स्वयं को वहाँ से बाहर निकाल लेते है और दूसरी जगहों पर भ्रमण करने लगते हैं। धीरे-धीरे समय के साथ जिन भूतों की इच्छा शक्ति मजबूत होने लगती है, वे चीजों को छूने, उठाने और फेंकने की कला सीख जाते है। यहाँ तक कि स्वयं को प्रकट करना और बातें करना भी।

“और अब तुम आज का आखिरी प्रश्न पूछो।” उस प्रेत ने कहा।   

‘भूत-प्रेत कहाँ रहते हैं?’ मैंने पूछा

‘हम हर जगह होते हैं।’ वह मुस्कुराकर बोला

‘मगर आपलोगों को हमेशा ठंडी और अंधेरी जगहों पर ही देखे जाने की बात कही जाती है।’

‘क्योंकि ऐसी जगहों पर तुम हमारी ऊष्मा महसूस कर सकते हो और हमारी मौजूदगी का पता लगा सकते हो। यह भूतों-प्रेतों को अच्छा लगता है जब कोई उनकी उपस्थिति का पता लगाता है, क्योंकि हम स्वयं भी ऐसा ही चाहते हैं।’ यह बोलकर वह प्रेत मेरी आँखों के सामने से ओझल हो गया।

देर रात हो चुकी थी और मैं अब भी बाल्कनी में बैठा था। मैं अपने कमरे की तरफ मुड़ा और मैंने देखा कि बिस्तर पर खाना रखा हुआ था और साथ में एक चिट्ठी भी, जिसपर लिखा था – ‘भोजन करने के बाद सो जाना, तुम्हें अच्छी नींद आएगी और अगली मुलाकात जल्द ही होगी।’

इसके फौरन बाद मैंने बिल्ली की आवाज़ सुनी जो बाल्कनी से आई थी। मैं फौरन बाल्कनी की ओर दौड़ा, मगर मेरे वहाँ पहुँचने से पहले वह जा चुकी थी।मुझे समझ में आ चुका था कि गेस्ट हाउस की चुड़ैल अपनी मौजूदगी दर्ज करवाने यहाँ आई थी।

जारी है…

Ritu Raj

मेरा नाम ॠतु राज है और मैं आपका Magical Hindi Stories में स्वागत करता हूँ। मेरी कोशिश आप सभी पाठकों तक ऐसी नई और रोचक हिंदी कहानियाँ पहुँचाने की है, जिन्हें आप अवश्य पढ़ना चाहेंगे।

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