डायनों का पेड़

डायनों को कौन नहीं जानता। भले ही लोग उनके अस्तित्व को नकारते हुए आए हो, मगर उनका खौफ अब भी लोगों के मन में वास करता है। ऐसा कोई नहीं जो इस कथन को नकार सके कि डायन होती है। मैं भी अब-तक इसी धारणा को मानता हुआ आया था कि डायन नहीं होती हैं। फिर एक रोज कुछ ऐसा हुआ-

मेरे गाँव से मुझे फोन आया कि मेरी दादी का निधन हो गया था। मैं फौरन अपने गाँव के लिए निकल पड़ा। चूंकि मेरे माता-पिता नहीं हैं, इसलिए मुझे अकेले ही जाना पड़ा। यात्रा के दौरान मुझे बार-बार उस पीपल के पेड़ का ख्याल आता रहा, जिससे मैं हमेशा डरा करता था। बचपन में मुझे ऐसा लगता था कि उस पेड़ में भूत-प्रेत रहा करते थें। जब मैंने यह बात अपनी दादी को बताई, तब उन्होंने मुझे फौरन शहर में एक बोर्डिंग स्कूल में पढ़ने के लिए भेज दिया। अब-तक मुझे ऐसा ही लगता हुआ आया था कि चूंकि उस पीपल के पेड़ को मेरे स्वर्गीय दादा जी ने लगया था, इसलिए जब मैंने उसके विषय में ऐसी बात कही, तो मेरी दादी नाराज़ होकर मुझे शहर पढ़ने के लिए भेज दिया। जो भी था मैं यह बात तो जानता ही था कि उन्हें उस पेड़ से बहुत लगाव था। यह मेरे दादा जी की आखिरी निशानी जो थी।

खैर, तकरीबन दस घंटे के सफर के बाद मैं अपने गाँव पहुँचा। मेरा गाँव एक वीराने में था। जंगल के भूल भुलैया रास्तों से होकर मैं अपने गाँव पहुँचा। शाम तक मेरी दादी का क्रिया कर्म समाप्त करने के बाद मैं गाँव के दूसरे लोगों से विदा लेकर अपने घर आया। मेरी दादी की सभी चीजें कमरे में इधर-उधर रखी हुई थीं, जिसे देखकर मुझे बार-बार उनकी याद आ जाती थी। मैं सुबह से भूखा था और मैंने एक कप चाय तक नहीं पी थी। फिर भी मुझे भूख नहीं लगी थी। मन उदास था और दूर-दूर तक खुशी की एक किरण भी नजर नहीं आ रही थी। ऐसे ही बिस्तर पर लेटे-लेटे मुझे कब नींद आ गई, मुझे इसका जरा भी अंदाजा नहीं है।

उस रात प्यास लगने से मेरी नींद खुली। मैं रसोईघर में गया और ग्लास लेकर हैंडपंप के पास पहुँचा। जब मैं ग्लास में पानी भर ही रहा था कि तभी मैंने खिड़की के बाहर, मेरे घर के पीछे वाले आँगन में किसी को खड़े देखा। कोई अनचाहा इंसान मेरे घर में घुस आया था। मैं चुपचाप बिल्कुल हल्के कदमों से खिड़की के पास पहुँचा। मैंने देखा कि एक औरत मेरे आँगन में मौजूद पीपल के पेड़ के पास बैठी रो रही थी। उसने सफेद साड़ी पहन रखी थी और बेहद अजीब ढंग से रो रही थी। कभी ऐसा लगता कि वह औरत रो रही है, तो अगले ही पल ऐसा लगता कि वह हँस रही हो।

‘कौन है वहाँ?’ मैंने कड़क आवाज़ में कहा।

मेरी आवाज़ सुनकर उस औरत का रोना बंद हो गया। इसी बीच मैंने पलक झपका और वह औरत मेरी नज़रों के सामने से गायब हो गई। सच में बड़ी अजीब घटना थी। मैं वापिस अपने कमरे लौट आया। कुछ ही देर में मैं फिर से गहरी नींद में चला गया। अभी सुबह नहीं हुई थी, जब मेरी नींद एक बार फिर से खुल गई। मेरी नींद जैस्मिन के फूलों के सुगंध से खुल गई थी। मैंने देखा कि एक औरत कमरे के दरवाज़े के पास खड़ी थी। कमरे में अंधेरा था, फिर भी मुझे उसकी सफेद साड़ी से आती हुई चमक साफ-साफ नजर आ रही थी।

“कहीं ये वही औरत तो नहीं जिसे मैंने पीपल के पेड़ के पास देखा था।” मैंने मन ही मन सोचा।

फिर मैंने उस औरत को रोते हुए सुना। इसके बाद वह घुटनों के बल रेंगती हुई मेरे बिस्तर के नीचे जा घुसी। मेरी सांसे तेज चलने लगी थी और दिल की धड़कने तेज हो गई थी। अब-तक मैं समझ चुका था कि वह कोई साधारण महिला नहीं थी। मुझे डर लग रहा था। फिर मैंने उस औरत को गाते हुए सुना-

“देर हो गई है, अब सो जा मेरे लाल,

रात घिर आई है, अब सो जा मेरे लाल।।”

वह बार बार इन शब्दों को दोहराते जा रही थी। और सच बताऊँ तो मुझे अचानक से नींद आने लगी। यह कोई साधारण बात नहीं थी। वह औरत मुझपर जादू कर रही थी। मैं फौरन अपने बिस्तर से उठा और दरवाज़े से बाहर भागने की कोशिश की कि तभी दरवाज़ा धड़ाम की आवाज़ के साथ बंद हो गया। इस दौरान उस औरत का गाना जारी रहा। जब वह औरत बिस्तर के नीचे से बाहर आई, तब जाकर मैंने पहली बार उसकी शक्ल देखी। उसका चेहरा लंबा था और जगह-जगह बड़े-बड़े घाव थें। फिर उसका पतला छरहरा शरीर सफेद साड़ी से चिपका हुआ था और जब मैंने उसके पैरों को देखा, तब तो मेरे होश ही उड़ गए। वह औरत नहीं एक डायन थी। उसके पैर पीछे की तरफ मुड़े हुए थें।

मैंने फौरन दरवाज़े को खोलने की कोशिश की, पर वह मुझसे नहीं खुला। अब मेरे पास सिवाय हिम्मत दिखाने के अलावा कुछ भी शेष नहीं बचा था।

मैंने हिम्मत दिखाते हुए उससे कहा ‘कौन हो तुम और क्या चाहती हो?’

इससे पहले मैं उसके जवाब का इंतजार कर पाता, वह औरत मेरी इन्हीं नज़रों के सामने से गायब हो गई। और उसी पल कमरे का दरवाज़ा चरमराते हुए खुल गया। फिर मैंने उसको घर के आँगन में खड़े देखा। मैं सहमे हुए कदमों से चलते हुए उसके पास पहुँचा। फिर वह घर के पीछे बने आँगन में गई और एक बार फिर से पीपल के पेड़ के पास जाकर खड़ी हो गई। लेकिन अब वह अकेली नहीं थी। वहाँ दर्जन भर और औरतें खड़ी थीं। जाहिर था वे सभी डायने थीं।

मैंने एक बार फिर से हिम्मत जुटाकर पूछा ‘कौन हो तुमलोग और क्या चाहती हो?’

इस बार भी कोई जवाब नहीं आया। बजाय इसके उन सभी ने एक साथ रोना शुरू कर दिया। उनकी आवाज़ इतनी ठंडी और भयानक थी कि मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मैं कुछ देर और वहाँ खड़ा रहा और उनके कुछ बोलने का इंतजार करता रहा। मगर वे सभी रोती रहीं। मैं वापिस मुड़ा और आँगन के दरवाज़े को बंद करने के बाद अपने कमरे में सोने चला गया।

उस रात मुझे नींद नहीं आई। जब सुबह हुई, तो मैं फौरन घर से बाहर निकला, ताकि मैं अपने आस-पड़ोसियों को यह किस्सा सुना सकूँ। मगर कोई भी मुझसे बात नहीं करना चाहता था। ऐसा लग रहा था कि वे सभी किसी चीज को लेकर मुझसे बेहद नाराज़ थें।

खैर जल्दी ही रात घिर आई और मैं अपने कमरे में लेटा हुआ था। तभी मुझे फिर से किसी के रोने की आवाज़ सुनाई दी। मैं बिना कोई आवाज़ किये उठा और चुपचाप खिड़की तक गया। मैंने देखा कि दर्जन भर डायन पीपल के इर्द-गिर्द एक गोल घेरा बनाकर बैठी हुई थीं। फिर उन्हीं में से किसी एक ने अपनी साड़ी के भीतर से एक बिल्ली को बाहर निकाला और अपने नाखून से उसका गला रेतकर मार डाला। फिर उसने उस बिल्ली को पीपल के पेड़ पर टाँग दिया और उसके खून को एक प्याले में जमा करने लगी। उसी वक्त मैंने देखा कि एक डायन वहाँ से गायब हो गई थी और अगले ही पल मैंने एक बार फिर से जैस्मिन के फूलों की खुशबू सूंघी। वह खुशबू मेरे पास से ही आ रही थी। मैं पीछे मुड़ा और डर के मारे वहीं नीचे गिर पड़ा। एक डायन मुझसे कुछ ही कदमों की दूरी पर खड़ी थी। उसने मुझे पैरों से पकड़ा और मुझे घसीटते हुए उस पीपल के पेड़ तक ले गई और मुझे बाँधकर पेड़ पर बिल्ली के साथ टाँग दिया। फिर उन सभी ने किसी तरह के मंत्र का उच्चारण करना शुरू कर दिया। उनमें से एक डायन आगे आई और जैसे ही अपने नाखूनों से मेरा गला रेतना चाहा, तभी मुझे घर के मुख्य दरवाज़े पर भयानक शोर सुनाई दी। फिर दरवाज़े के टूटने की भी। सभी गाँव वाले इक्कठा होकर अपने हाथों में मशाल लिये घर में दाखिल हुए और घर के पीछे वाले आँगन में पहुँचे, जहाँ उन डायनों ने मुझे बांध रखा था। यह देखकर सभी डायने वहाँ से गायब हो गई। गाँव वालो ने मुझे पेड़ से नीचे उतारा। फिर उस पीपल के पेड़ में आग लगा दी। और जैसे ही वह पेड़ जलना शुरू हुआ, सभी डायने एक बार फिर से चिल्लाते हुए प्रकट हो गई। वे सभी उस पीपल के पेड़ में ही वास करती थीं। उन सभी का शरीर बुरी तरह से जल रहा था। हमलोग यह दृश्य देखकर दहल उठे थें। वे इधर-उधर भागने की कोशिश करती, मगर गाँव वालों ने उन्हें चारों तरफ से घेर रखा था। जल्दी ही उनका पूरा शरीर राख में बदल गया और वह पीपल का पेड़ भी पूरी तरह से आग में झुलस गया।

मैंने गाँव वालों से पूछा कि वे तो सुबह तक मुझसे डायनों के बारे में बात भी नहीं करना चाहते थें फिर अचानक वे मेरी मदद करने कैसे आ पहुँचे। तब हमारे गाँव के मुखिया ने बताया कि वे मुझे इस बात की भनक भी नहीं लगने देना चाहते थें कि वे आज की रात पेड़ को जलाने वाले थें। अगर मुझे इस बात की खबर होती, तो संभव है कि डायनों को भी पता लग गया होता। मुखिया जी ने बताया कि डायने मन पढ़ने में भी माहिर होती हैं। गाँव वाले तो बहुत पहले से ही इस पीपल के पेड़ को जला देना चाहते थें, मगर मेरी दादी ने अपने जीते-जी ऐसा नहीं होने दिया। परंतु मुझे मुसीबत में पाकर गाँव वालो को पेड़ जलाना ही पड़ा।

मैंने सभी गाँव वालों का मेरी जान बचाने के लिए शुक्रिया अदा किया, और अगले दिन अपने साथ एक अद्भुत किस्से को लिये वापिस शहर लौट गया।

***

Ritu Raj

मेरा नाम ॠतु राज है और मैं आपका Magical Hindi Stories में स्वागत करता हूँ। मेरी कोशिश आप सभी पाठकों तक ऐसी नई और रोचक हिंदी कहानियाँ पहुँचाने की है, जिन्हें आप अवश्य पढ़ना चाहेंगे।

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